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पाकिस्तान : क्या जरदारी के पास समाधान है

अपने चुनाव के तुरंत बाद जरदारी ने दो टूक कहा कि उन्हें यह पद इसलिए मिला है कि वे बेनजीर भुट्टो के पति हैं। राजनीति में तकदीर एक बहुत बड़ी चीज होती है। यदि आज मुशर्रफ राष्ट्रपति होते तो मुमकिन है कि जरदारी को पहले की तरह ही जेल के सींखचों के अंदर दिन काटने पड़ते। वे हमेशा से एक विवादास्पद व्यक्ित रहे हैं। जब बेनजीर भुट्टो पाकिस्तान की प्रधानमंत्री थी, उस समय जरदारी पर दोनों हाथों से पाकिस्तान को लूटने के आरोप लगते थे। कहा जाता था कि वे कोई भी काम बिना रिश्वत के नहीं करते, इसलिए उनका नाम ‘मिस्टर टेन परसेन्ट’ पड़ गया था। भ्रष्टाचार के मामले में उनके खिलाफ दर्जनों मामले विभिन्न न्यायालयों में लंबित थे जिसके कारण उन्हें वर्षो जेल की सजा भुगतनी पड़ी थी। पाकिस्तान की जो स्थिति है, उसमें अमेरिका पूरी तरह जरदारी के साथ सहयोग करने को तैयार है। अमेरिका पाकिस्तान में अलकायदा और तालिबान की बढ़त को रोकना चाहता है क्योंकि अमेरिका के गुप्तचरों को यह पक्की सूचना है कि अलकायदा और तालिबान के आतंकवादी पाकिस्तान में जमे हैं और वहीं से पड़ोसी देशों में आतंकवादी वारदात कर रहे हैं, लेकिन क्या जरदारी पाकिस्तान में रह रहे कट्टरपंथियों पर नियंत्रण पा सकेंगे? अमेरिका को इस बात का पूरा डर है कि कहीं जरदारी की गलती या लापरवाही से पाकिस्तान के परमाणु हथियार आतंकवादियों के हाथ नहीं लग जाएं। पाकिस्तान में शुरू से ही सेना का वर्चस्व रहा है और जब-ाब वहां पर गैर सैनिक सरकारों की स्थापना हुई है, उसे फौाी विद्रोह के द्वारा सत्ताच्युत कर दिया गया है। कोई भी सेना का प्रधान हमेशा यही कसम खाता है कि वह जनता के द्वारा चुनी हुई सरकार के कामकाज में दखल नहीं देगा, परंतु मौका मिलते ही वह चुनी हुई सरकार को सैनिक विद्रोह करके अपदस्थ कर देता है, यह कहकर कि इस सरकार में भ्रष्टाचार का बोलबाला था जिसके कारण जनता कराह उठी थी। अब सैनिक सरकार सब ठीक कर देगी। पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल कियानी ने कई बार सार्वजनिक रूप से यह कहा है कि वे चुनी हुई सरकार के कामकाज में दखल नहीं देंगे, परंतु कहने और करने में बहुत अंतर होता है। पाकिस्तान में मुस्लिम कट्टरपंथियों का जोर बढ़ता ही जा रहा है। सबसे बड़ी बात यह है कि पाकिस्तान की नई सरकार ने अमेरिका के कहने पर वहां की खूंखार गुप्तचर एजेंसी आईएसआई को चुनी हुई सरकार के गृह मंत्रालय के तहत रखने की कोशिश की, परंतु सेना ने इसका विरोध किया और अंत में आईएसआई सेना के अधीन चली गयी। आईएसआई में ही आतंकवादियों के समर्थक भर पड़े हैं। आईएसआई न केवल आतंकवादियों को पाकिस्तान के अंदर बल्कि पाकिस्तान से बाहर बांग्लादेश, नेपाल और म्यांमार में आतंकवादियों के ट्रेनिंग कैम्प खोलकर उन्हें नवीनतम हथियार चलाने की ट्रेनिंग देती है और भारत जसे देश में आए दिन आतंकवादी हरकतें कराती रहती है। जाहिर है कि चाहकर भी जरदारी आईएसआई की गतिविधियों पर नियंत्रण नहीं पा सकेंगे। अमेरिका इस जल्दी में है कि पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच अलकायदा और तालिबान के जो आतंकवादी रह रहे हैं, उनका जल्दी से जल्दी सफाया किया जाए। एक बार अमेरिका ने इस क्षेत्र में बम बरसा भी की थी जिसमें 400 आतंकवादी मार गए थे, परंतु स्थानीय पाकिस्तानियों ने इसका घोर विरोध किया था यह कहकर कि यह पाकिस्तान के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप है। अब जरदारी अमेरिका को ऐसा नहीं करने देंगे। यह भी सच है कि पाकिस्तान की आर्थिक हालत आज की तारीख में अत्यंत ही खस्ता है। वहां पर महंगाई 25 प्रतिशत बढ़ गई है। जरदारी तो पहले से ही बदनाम हैं। इसी बीच अमेरिकी राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी ओबामा ने यह रहस्योद्घाटन किया है कि पिछले अनेक वर्षो से पाकिस्तान को कट्टरपंथियों से लड़ने के लिए जो अथाह धन मिला, उसे उसने भारत पर चढ़ाई करने के लिए अपने जवानों को प्रशिक्षित करने में लगाया। अमेरिका की उलझन स्पष्ट है। यदि वह जरदारी की मदद नहीं करता है तो पाकिस्तान में आतंकवादी और भी अधिक मजबूत हो जाएंगे और यदि वह जरदारी की आर्थिक सहायता करता है तो उस धन का 0 प्रतिशत विदेशों में जमा हो जाएगा। पाकिस्तान की जनता पहले की तरह ही दीन-हीन और असहाय रह जाएगी। इस उलझन भरी स्थिति में सार संसार की आंखें जरदारी की ओर लगी हुई हैं और वे ये देख रही हैं कि क्या जरदारी पाकिस्तान की समस्याओं का समाधान कर पाएंगे? लेखक पूर्व सांसद एवं पूर्व राजदूत हैं

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  • Web Title: पाकिस्तान : क्या जरदारी के पास समाधान है