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खुद मंत्री मानते हैं दूरदर्शन को सरकारी भोंपू

दूरदर्शन और आकाशवाणी शुद्ध रूप से सरकारी तंत्र हैं और इनकी स्वायत्तता केवल कागजी है। यह बात हाल में प्रसारभारती का भविष्य तय करने के लिए गठित मंत्रियों के समूह (ाीओएम) की बैठक में प्रमुखता से उठी। सूत्रों के अनुसार, बैठक में पंचायती राज मंत्री मणिशंकर अय्यर ने प्रसारभारती की स्वायत्तता को एक तरह से कागजी बताते हुए कहा कि व्यावहारिक दृष्टि से स्वायत्तता कभी अस्तित्व में आई ही नहीं। मणिशंकर अय्यर ने कहा कि सच्चाई यह है कि प्रसारभारती ने अपने गठन से लेकर अब तक स्वायत्त संस्था की तरह नहीं, बल्कि एक सरकारी विभाग की तरह काम किया है और प्रसारभारती के गठन (23.11.1े 10-11 साल बाद भी यह संस्था अभी तक बदलने की चेष्टा में ही है। यह बैठक प्रसारभारती के कर्मचारियों के भविष्य तय करने के लिए बुलाई गई थी। कर्मचारी मांग कर रहे हैं कि उन्हें सरकारी कर्मचारी घोषित किया जाए जबकि सूचना व प्रसारण मंत्रालय ने इसका विरोध करते हुए कहा है कि प्रसारभारती में काम कर रहे कर्मचारियों को ‘सरकारी कर्मचारियों के समकक्ष’ माना। लेकिन बहस के दौरान स्वायत्तता का मुद्दा उठ गया कि प्रसारभारती सरकारी संस्थान है या स्वायत्त संस्थान? इस संस्था को सरकारी नियंत्रण से मुक्त एक स्वायत्त संस्था माना जाता है। बैठक में मौजूद मंत्री अंबिका सोनी ने भी सवाल उठाया कि प्रसारभारती में भारतीय सूचना सेवा के अधिकारियों की नियुक्ित करके क्या सरकार का इरादा प्रसारभारती को सरकारी कब्जे में रखना है? मामले की गंभीरता को समझते हुए गृह मंत्री शिवराज पाटिल ने बचाव किया और कहा कि सरकार को समर्थन करने वाले मीडिया के तौर पर प्रसारभारती की जरूरत रही है।

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