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रुको कोसी

बड़ी बहन गंगा से मिलने दौड़ी जा रही थी न? बहन मिल गई, अब चैन से बहो। तुम्हें दिखाना था कि मानवीय अवरोध की तुम परवाह नहीं करतीं। सालों के अनथक प्रयास, श्रमदान से तुम्हारी धारा को इच्छित दिशा में मोड़ा गया था। पड़ोसी देश से संधि की गई थी। तुम्हारी देख-रख रख-रखाव हमार ऊपर ही था। हमारी लापरवाही का ही तुमने फायदा उठाया, अपना आदिम स्वभाव याद आया और अनेक धाराओं में, मनमानी दिखाओं में बांध तोड़ कर दौड़ चली। तुमसे कोई शिकायत नहीं, यह तुम्हारा जन्मजात स्वभाव रहा है। गलती तो हम मानवों से ही होती है, तुम्हारी थोड़ी अवहेलना हुई, देख-रख में सावधानी नहीं बरती गई और तुमने अपना रास्ता बदल लिया। मानव स्वभाव भी ऐसा ही है, जिनसे रख-रखाव, रक्षा की आशा रखता है, उससे उपेक्षा मिलने पर, उसमें सांघातिक द्रोहभाव उभर आता है। वह मनमानी दिशा की ओर मुड़ जाता है। ‘लोक कथा’ में तुम्हारा चित्रण गुस्सैल नायिका के रूप में किया गया है। कहा जाता है कि तुम अपनी ससुराल से बहन से मिलने के लिए चलीं दुर्दात वेग से, रास्ते में एक दैत्य मार्ग रोक कर खड़ा हो गया। तुमने फुफकारते हुए अपने को कई धाराओं में विभक्त कर लिया और उसे घर पर परास्त किया। राक्षस की हार हुई, तुम अपनी धाराओं को समेटती गंगा की खोज में अनवरत दौड़ती आखिर अपना लक्ष्य पा गई। ‘कुरसेला’ में तुम्हें ‘गंगा’ बहन मिली, तुम्हारी सारी उत्तेजना, रािंश बह गई। दोनों बहनें गले मिलीं और तुमने अपने प्रवाह को संयमित किया। आज भी तो वही मंजर है। ‘गंगा’ तुम्हें मिल गई, मानव निर्मित मार्ग को छोड़ तुमने इच्छित मार्ग को पकड़ा। कितने बड़े समुदाय को तुमने जड़ से उखाड़ दिया। बड़ी बहन से सीख लो, अब शान्त हो जाओ। उाड़े हुए लोगों को घर लौटने का रास्ता दो।ं

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