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अराजकता की आग और चुप बैठी सरकार

पिछले दिनों सारे देश का ध्यान हमारी सरकार की उस ऐतिहासिक और अभूतपूर्व उपलब्धि की ओर एकटक लगा रहा जिससे ‘एक दो तीन आ जा मौसम है रंगीन’ वाला पुराना फिल्मी गाना याद आता रहा है। किसी को परमाणविक ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग वाले अमेरिका के साथ करार ने यह सोचन की फुर्सत नहीं बख्शी है कि जरा यह भी विचारा जा सके कि रंगीन नहीं बल्कि यह हकीकत कितनी संगीन है। हिन्दुस्तान का बहुत बड़ा भाग अराजकता की आग की लपटों में घिरा है और जो शोले वर्षो से ठंडी राख में दबे थे, बुरी तरह भड़क उठे हैं और उन पर काबू पाना लगभग असंभव दिखलाई दे रहा है। केन्द्र सरकार बार-बार यह कहकर अपने हाथ झाड़न की कोशिश करती है कि आतंकवाद हो या सांप्रदायिक हिंसा का विस्फोट, शांति और सुव्यवस्था, कानून वगैरह राज्य सरकार के कार्याधिकार क्षेत्र में आते हैं, इसलिए नाकामी और लापरवाही का ठीकरा उन्हीं के सर पर फोड़ा जाना चाहिए। यह बात उन सभी राज्यों में साफ नजर आती है जहां नक्सलवादी-माओवादी, बागी पुलिस और सहसैनिक दस्तों की नाक में चने चबवा रहे हैं। झारखंड और छत्तीसगढ़ के बहुत बड़े भू-भाग तक इन्हीं हिंसक विद्रोहियों का कब्जा है और सरकार की संप्रभुता की बात करना बिल्कुल निर्थक है। कुछ ही दिन पहले राष्ट्रपति के दौरे के दौरान हिफाजत के बंदोबस्त में तैनात सीआरपीएफ की एक गाड़ी को नक्सलियों ने जमीनी सुरंग से उड़ा दिया सरकार के इस दाव की धज्जियां उड़ाते हुए कि नई रणनीति- सल्वाजुडूम से इतर अब सफल होने लगी है। उस हैलिकॉप्टर की बात जाने हम कैसे इतनी जल्दी भूल गये हैं जो छत्तीसगढ़ के जंगली इलाके के ऊपर उड़ान भरता गायब हो गया। महीनों बीत गये और भारतीय वायुसेना के बहुविज्ञापित जांबाज कौशल के बावजूद इसके मलबे तक का पता नहीं लगाया जा सका है।ड्ढr यह बात वास्तव में आश्चर्यजनक ही नहीं शर्मनाक भी है। स्कूली बच्चा भी यह जानता है कि विमानों में ब्लैक बॉक्स सरीखे यंत्र लगे होते हैं जो दुर्घटनाग्रस्त होन के बावजूद भी सुराग टोहने में मदद करते हैं। और कुछ समय पहले दर्जनों कमांडों से लदी एक नाव को उड़ीसा के तटवर्ती इलाके में झील सरीखे माहौल में हमलावरों ने डुबो दिया था। उसके शहीदों को श्रद्धासुमन चढ़ान के अलावा जवाबी कार्रवाई का अता-पता किसी को नहीं है। याद रहे ये सब हमले ऐसे आत्मघातक आतंकवादियों ने नहीं किये थे जिनके बारे में यह कहा जा सके कि उनके विरुद्ध किसी भी तरह का सुरक्षा कवच शत-प्रतिशत सफल नहीं हो सकता। कड़वा सच यह है कि नक्सल हिंसाग्रस्त दर्जन भर राज्य हों या अलगाववाद की चपेट में फंसा क्षत-विक्षत जम्मू-कश्मीर, राज्य की संप्रभुता को चुनौती देने वाले तत्वों के साथ जियो और जीने दा की नीति अपनान के कारण ही आज अराजकता हमारे सामने इस तरह मुंह बाये खड़ी है। सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि हर बड़ा-छोटा राजनीतिक दल हर घटना का मूल्यांकन और विश्लेषण अपने चुनावी स्वार्थो को ध्यान में रखते हुए कर रहा है। इसके लिए सबसे बड़ी जिम्मेदारी खुद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाले केंद्र में तख्तनशीं सरकार की है। यह एकदम साफ नजर आ रहा है कि सत्तारूढ़ गठबंधन आगामी चुनावों को ध्यान में रखते हुए अपने विपक्षियों और प्रतिपक्षियों को बदनाम कर पस्त-वस्त करना चाहता है। इसकी सबसे अच्छी मिसाल नवीन पटनायक का शासनाधीन उड़ीसा है जिसमें भारतीय जनता पार्टी सहयोगी की भूमिका निभा रही है। यह सच है कि कंदमाल इलाके में ईसाई अल्पसंख्यकों के खिलाफ जो सांप्रदायिक हिंसा भड॥की है, उस पर नियंत्रण पाने में पटनायक असमर्थ रहे हैं। प्रधानमंत्री ईसाइयों पर हमलों को शर्मनाक ता करार देते हैं, पर पटनायक की उस अर्जी पर विचार करन को तैयार नहीं जिसमें उन्होंने अतिरिक्त केंद्रीय सुरक्षा बलों की मांग की है। कुछ इसी तरह की सोच आतंकवाद की घटनाओं में बढ़ोतरी के बारे में भी देखी जा सकती है। अगर गुजरात में बम धमाके होते हैं तो इसके लिए नरेंद्र मोदी के हिन्दुत्व को ही प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जिम्मेदार ठहराया जाता है। उनकी मदद करन की बात भला केंद्र सरकार कैसे सोच सकती है? इससे भी अधिक चिंताजनक बात यह है कि जब नानावती आयोग ने अपनी रिपोर्ट का एक हिस्सा पेश किया तो तत्काल उसे सिरे से खारिज करन की और पक्षपातपूर्ण सिद्ध करन की कोशिश की गई। हमारी समझ में उन सारे जांच आयोगों के बारे में संयम बरतने की जरूरत है जिनकी अध्यक्षता उच्च या सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति करते हैं, चाहे वह कार्यरत हों या अवकाश प्राप्त। न्यायपालिका की निष्पक्षता पर सवालिया निशान लगाना न्यायपालिका की महिमा और गरिमा को खंडित ही कर सकता है। जाहिर है यदि एक बार यह छवि धूमिल होती है तो फिर इसकी पुन: प्रतिष्ठा बहुत कठिन हो जायेगी। पता नहीं इसके बाद कानून का राज कितनी देर तक चल सकता है। इस बात को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता कि हमारी न्यायपालिका आज विवादों से अछूती नहीं। उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश इस बात के लिए विवश हुए हैं कि अपने एक सहोदर न्यायाधीश पर महाभियोग लगाये जान की सिफारिश कर चुके हैं। राजधानी के एक पड़ोसी राज्य में उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश के घर लाखों रुपय का तोहफा पहुंचाये जाने वाला प्रसंग भी जांच के दायरे में है। कुल मिलाकर न्यायपालिका और विधायिका दोनों का ही इकबाल आज इतना बुलंद नहीं समझा जा सकता जिसका दावा सीना ठोक कर किया जाता रहा है। इसमें आश्चर्य नहीं किया जाना चाहिए कि हर जरूरतमंद आदमी पीड़ित हो शोषित या स्वयं उत्पीड॥क शोषक हो बाहुबल से या छल-कपट से अपना हक हासिल करना चाहता है या दूसरों को उनके हक से वंचित रखना चाहता है। आज ये दोनों ही स्थितियां अराजकता को बढ़ावा और बुलावा देने लगी हैं। अनेक जघन्य अपराधों में अभियुक्त करार दिये जान के बाद भी बहुत सार समर्थ सांसद-विधायक कानूनी दंड भोगने से बचे रहते हैं। कारावास में भी ‘वीरभोग्या वसुंधरा’ का जाप करते अपना जंगल राज चलाते हैं। आखिर मत्स्य न्याय हमारी परंपरा की मूल्यवान धरोहर है। कम से कम फिलहाल तो यही लग रहा है। लेखक जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्राध्यापक और अंतरराष्ट्रीय अध्ययन संकाय के अध्यक्ष हैं।ं

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