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मेला अलबेला, चहुंओर रला

मेला है अलबेला चहुंओर रला है। मेन रोड, कचहरी रोड, कोकर रोड और अपर बाजार इलाके में तरह- तरह की दुकानें सजीं हैं। पिस्टल, गन, एके 47 से लेकर इंसास तक उतरा है बाजार में। भोंपू- बाजा की आवाज बच्चों को दूर से ही रिझाती हैं। फिर चौराहे या सड़क किनारे बूढ़े बांसुरी वाले की धुन- परदेशी- परदेशी जाना नहीं मुझे छोड़ कर की अपनी अलग पहचान है। झूले- सर्कस भी लगे हैं। चकमक और झिलमिलाती बत्तियों से आंखे नहीं हटतीं। खेल- तमाशे वाले भी आये हैं। मेले में क्या पहुंचे : तरह- तरह के जुमले सुनाई पड़ेंगे : अर भाई उधर कहां इधर देखो - ये लड़की सोती नहीं। जगी भी नहीं रहती। छोटों का पांच बड़ों का दस लगेगा। छूट गये, तो पछताओगे। आज यहां कल वहां हमारा क्या है..। मौत के कुंआ का रोमांच भी कम नहीं। फटफटिया क्या कार तक नचा रहे हैं कलाकार। चाट - चाउमिन वालों की मेले पर पकड़ ज्यादा है। फुचका वालों का हाथ रुक नहीं रहा। घोंट- घोंट कर इमली पानी पिला रहा है। कल तक दो का तीन देते थे, पर मेले का भाव दो का सीधे दो। कोई खिलौने खरीद रहा है, तो किसी की हाथो में मेंहदी - टेटू लग रहा है। कांधे पर बुतरू और बुतरू के मुंह में बाजा इस नजार का अलग ही अंदाज है। चारों तरफ गहमागहमी है।

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