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8 बिरहोरों के बाद अब 9 बैगा भी

हिंदिया कला गांव में आठ बिरहोरों की मौत का मसला शांत भी नहीं हुआ था कि भीतहा में आदिम जनजाति बैगा के नौ लोगों की मौत की खबर से सनसनी फैल गयी। इनलोगों की मौत एक महीने के अंदर हुई है।अज्ञात बीमारी से मरनेवालों में छह बच्चे भी शामिल हैं। उधर, सिविल सर्जन डॉ रमेश प्रसाद का कहना है कि जब तक मामले की जांच नहीं होती, तब तक इस मामले में कुछ भी कहना ठीक नहीं होगा।ड्ढr भीतहा के ग्रामीणों ने बताया कि जो लोग मर, पहले उन्हें बुखार आया। बाद में खांसी हुई और धीर-धीर शरीर सूखने लगा और दस दिन में मौत हो गयी। कुछ को खांसने पर खून की उल्टी भी हुई थी। गांव के मंगर बैगा का कहना है कि कभी भी यहां टीकाकरण नहीं हुआ और न ही कोई सरकारी लाभ मिला। ये लोग गैटी-टोना खाकर जीवन बसर कर रहे हैं। कभी-कभार चावल नसीब होता है। सार बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। गांव प्रतापपुर प्रखंड के जोगियारा पंचायत का हिस्सा है। गांव में बैगा जनजाति के लोगों के मात्र 20 घर हैं। प्रतापपुर से इस गांव की दूरी पांच किलोमीटर है।ॅड्ढr भीतहा में मरनेवालों में मांगर बैगा की पत्नी कबूतरी बैगा (40), गोला का पुत्र कारू बैगा (5), फगुनी बैगा की दो लड़की और एक लड़का, कृष्णा बैगा का पुत्र छोटू बैगा (5), फगुनी की मां बालो बैगा (50), रामजी का पुत्र राजेश बैगा (3) और झकसु की पत्नी सोमरी बैगा (25) शामिल हैं। फगुनी बैगा की पत्नी भी बीमार है। फिलहाल वह अपनी पत्नी का इलाज सिदकी गांव में एक झोलाछाप डॉक्टर से करवा रहा है। पहले ही उसकी मां और तीन बच्चे काल के गाल में समा चुके हैं। इसके अलावा गोलू बैगा का पुत्र टकलु बैगा (चार वर्ष), कृष्णा बैगा का पुत्र राजा बैगा (तीन माह), सुकन बैगा की बेटी फुलवा बैगा (5), रामजी बैगा की पुत्री बुनिता बैगा (5) और संजय बैगा की पुत्री अनिषा बैगा (2) भी बीमार हैं। इनका इलाज नहीं हो रहा है। स्कीम इतनी फिर भी मर रही आदिम जनजातिजीतेंद्र कुमार रांची सामान्य आदिवासियों के लिए चल रही योजनाओं के इतर आदिम जनजातियों के लिए केंद्र-राज्य प्रायोजित लगभग दर्जन भर विशेष योजनाओं चल रही हैं। इसका उद्देश्य विलुप्त होती लगभग नौ लाख आदिम जनजातियों को बचाना, उनका विकास करना और समाज की मुख्य धारा से जोड़ना है। फिर भी वे मर रहे हैं। विकास योजनाओं को जमीन पर लागू करने में राज्य सरकार की लचर व्यवस्था के कारण विकास के बदले उनका विनाश हो रहा है। चतरा में आठ बिरहोरों की मृत्यु के बाद सरकार की आंख खुली है, पर आगे भी वह खुली रहेगी, इसकी कोई गारंटी यहां नहीं है।

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