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पूंजीवाद का पतन

ाब नौजवानी के दिनों में हम कम्युनिस्ट पार्टियों के हमसफर थे तो हमें बताया गया था कि पूंजीवाद पतनशील है और ढहने ही वाला है। जसे दशहर में रावण। हम लोग प्रतीक्षा करते थे कि पूंजीवाद ढहे और समाजवाद आए तो चैन मिले। गरीबों, किसानों, मजदूरों का राज हो और हम भी उस नजार को आंख भर कर देखें। हालांकि हमारी जिस तरह की फितरत थी, उसमें हम तब भी कम्युनिस्ट राज में खुद को जेल के पीछे या साइबेरिया के बर्फीले तूफानों में पाते थे। लेकिन न तो पूंजीवाद ढहा न समाजवाद आया। पूंजीवाद मजबूत होता गया और उसने हमें जेल भेजने लायक भी न पाया। पूंजीवाद ने हमें एक छोटी-मोटी मुलाजिमत करने लायक ही माना। पिछले दिनों अचानक वॉल स्ट्रीट की तमाम छोटी-मोटी बड़ी बैंकें लुढ़कने लगीं। फिर दिल में उस पुराने जज्बे ने जोर मारा- क्या पूंजीवाद का पतन हो रहा है? कई आशावादी वामपंथी मित्रों का मानना है कि ऐसा ही है। पूंजीवाद ढह रहा है। एक दिन सारी दुनिया की बैंकें ढह जाएंगी। न जॉर्ज बुश, न गार्डन ब्राउन, न एंजेला मकैल उन्हें संभाल पाएंगी। मजदूरों, किसानों का राज आएगा। मुझे मजदूरों, किसानों के राज में खास इंटरस्ट नहीं बचा, इस उम्र में साइबेरिया जाना कोई नहीं चाहेगा, क्योंकि उम्र जितनी भी हो जाए, फितरत तो बदलने से रही, न अपनी बदलेगी, न हमार वामपंथी मित्रों की बदलेगी। मजदूरों, किसानों को भी मजदूरों किसानों के राज से खास फायदा हुआ, ऐसा सुनने में नहीं आता। लेकिन फिर भी पूंजीवाद ढह जाए तो कुछ अच्छा लगेगा। काले सूट वाले लोगों को, बीएमडब्ल्यू और मर्सीडीा वालों को साइबेरिया जाते देख कुटिल किस्म की खुशी हो सकती है, बशर्ते आप उनके साथ न हों। यह क्या बात है कि पांच सितारा होटल में लंच के समय आप साथ न हों, लेकिन साइबेरिया जाते वक्त साथ हों। लेकिन जितना भरोसा मुझे पूंजीवाद पर है, उतना वामपंथी मित्रों पर नहीं है। पूंजीवाद का मूल चरित्र ‘स्ट्रीट फाइटर’ का है। मेर एक मित्र ने बताया कि अच्छे-अच्छे बॉक्सर स्ट्रीट फाइटरों से लड़ने में डरते हैं क्योंकि स्ट्रीट फाइटर जीतने के लिए कुछ भी कर लेगा। बॉक्सर तो तकनीकी एंगेल्स लड़ता रहेगा, स्ट्रीट फाइटर पत्थर उठा कर मार देगा। स्ट्रीट फाइटर में लड़ने और किसी भी तरह से जीतने का जज्बा होता है, वही पूंजीवाद में है। लेकिन फिर भी देख रहा हूं कि क्या पता पूंजतीवाद गिर ही जाए। अब अगर गिरगा तो एक ही उम्मीद है। ढहता-गिरता एकाध पूंजीवाद का टुकड़ा ही पकड़ में आ जाए। आनेवाला जो भी निजाम हो, वह टुकड़ा काम आएगा।

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  • Web Title: पूंजीवाद का पतन