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आस्था वही जो पर्यावरण बचाए

मामला आस्था का है इसलिए अक्सर सवाल नहीं उठाए जाते, लेकिन पर्यावरण का मामला अब हमार अस्तित्व का प्रश्न बन चुका है। इसलिए हर उस जगह सवाल उठाने की जरूरत है, जहां आस्था का सार्वजनिक प्रदर्शन पर्यावरण को बिगाड़ रहा हो, उसे प्रदूषित कर रहा हो या उसके संतुलन को डगमग कर रहा हो। गणेशोत्सव की धूमधाम खत्म हुए ज्यादा दिन नहीं बीते कि अब नवरात्र को मनाने के लिए जगह-जगह बिठायी जा रही मां दुर्गा की प्रतिमाओं के बहाने यह बात जेरे बहस आयी है। कोई यह पूछ सकता है कि क्या वाकई मुद्दा इतना गम्भीर है कि इस शुभ घड़ी में उसे उठाया जाना जरूरी हो गया है या यह महज विघ्नसंतोष का मामला है। दरअसल इसके बारे में आधिकारिक सूचना हमें केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से मिल सकती है। तीन साल पहले ही उसने दिल्ली में यमुना का अध्ययन कर बताया था कि किस तरह नदी का ‘दम घुट’ रहा है। बोर्ड के निष्कर्षो के मुताबिक सामान्य काल में पानी में पारे की मात्रा लगभग न के बराबर होती है, लकिन उत्सवों के समय में वह अचानक बढ़ जाती है। यहां तक कि क्रोमियम, तांबा, निकेल, जस्ता, लोहा और आर्सेनिक जैसी भारी धातुओं का पानी में अनुपात भी बढ़ जाता है। दिल्ली के जिन-जिन इलाकों में मूर्तियां बहायी जाती हैं, वहां के पानी के सैम्पलों को लेकर अध्ययन करन के बाद बोर्ड ने पाया कि मूर्तियां बहाने से ‘पानी की चालकता (कन्डक्िटविटी), ठोस पदार्थो की मौजूदगी, जैव रसायनिक आक्सीजन की मांग यानी बॉयोआक्सीजन डिमांड और घुले हुए आक्सीजन में कमी’ बढ़ जाती है। अनुमान लगाया गया है कि हर साल लगभग 1,700 मूर्तियां दिल्ली के अलग-अलग इलाकों में बहायी जाती हैं और उसका निष्कर्ष है कि इस कर्मकांड से नदी को कभी न ठीक होने लायक नुकसान हो रहा है और प्रदूषण फैल रहा है। जनता के एक छोटे से हिस्से में इस सिलसिले में आ रही जागृति की झलक कुछ अदालती हस्तक्षेपों या सरकारों के स्तर पर उठाए गए कदमों में भी दिखती है। लोगों को यह जानकर आश्चर्य भी हो सकता है कि कुछ साल पहले ही चेन्नई की उच्च अदालत ने गणेश मूर्तियों के विसर्जन पर फौरी रोक लगा दी थी। अदालत ने उस याचिका को स्वीकार किया जिसके अन्तर्गत बताया गया था कि रसायनों के इस्तेमाल से बनी मूर्तियां समुद्र और अन्य जलस्रेतों को प्रदूषित करती हैं। इस मामले में अदालत ने प्रदेश सरकार और राज्य के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को लिखा था कि वह इस मामले में अपने रुख को स्पष्ट करे। यह अकारण नहीं था कि इस बार गणेशोत्सव के वक्त मुंबई की मेयर ने गणेश प्रतिमाओं के विसर्जन के लिए 22 कृत्रिम जलाशय बनाए थे, जिनमें से दो मेयर के अपने आवास में थे। बारह फुट गहरे इन जलाशयों का इस्तेमाल प्लास्टर ऑफ पेरिस और पर्यावरण के अनुकूल पदार्थो से बनी गणेश की प्रतिमाओं को विसर्जित करन के लिए किया गया था। मुम्बई आईआईटी के विशेष सहयोग से मुंबई में बने इस कृत्रिम जलाशय में प्रतिमा विसर्जन के बाद इसके अवशेषों का पुनर्चक्रण कर इनका इस्तेमाल मूर्तियां, ईंट व टाइल्स बनान के लिए यहां तक कि जमीन भरन के लिए करन की योजना बनी है। दूसरी तरफ हैदराबाद की ‘ग्रीनकार्प्स’ और पुण की ‘कल्पतरू’ जैसी संस्थाएं उन समूहों में शुमार थीं, जो गणेशोत्सव के काम में अपने ढंग से जुटे थीं। यह जुदा बात है कि उनका काम आस्था के इस विशाल प्रदर्शन से जनित उस समस्या को न्यूनतम करने पर था, जिसे हम प्रदूषण नाम से जानते हैं। कोशिश यह भी थी कि किसी की आस्था को आहत किए बिना प्रतिमाओं को विसर्जित करने का ऐसा तरीका निकाला जाए जो वैज्ञानिक भी हो। जलस्रेतों को प्रदूषित भी न कर। साथ ही जिस पानी में यह विसर्जन हुआ, उसे रिसाइकिल भी किया जा सके। इतना ही नहीं दो साल पहले आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने पर्यावरण प्रेमी समूहों की याचिका पर मूर्ति विसर्जन के बारे में वैकल्पिक व्यवस्था करन के लिए विभिन्न विभागों को आदेश दिया था। दरअसल उच्च न्यायालय उस याचिका पर अपनी प्रतिक्रिया दे रहा था, जिसके अन्तर्गत इस वार्षिक अनुष्ठान के चलते बढ़ते सार्वजनिक जलाशयों के प्रदूषण का विवरण उसके सामने पेश किया गया था। गौरतलब था कि प्रदेश के महाधिवक्ता ने भी अदालत के सामने हाजिर होकर इस सम्बन्ध में तथ्य पेश किये थे, जिसमें उन्होंने बताया था कि किस तरह मूर्तियों के चलते जल प्रदूषण बढ़ता है। हमारे समाज में आस्था का जिस किस्म का सियासी दोहन दिखता है, उसीका नतीजा है कि आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ चन्द सियासी जमातें खड़ी हुई थीं और उन्होंने बाकायदा आरोप लगाया कि किस तरह यह अदालती आदेश बहुसंख्यकों के ‘धार्मिक अधिकारों’ का हनन कर रहा है। जिन दिनों आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के आदेश पर वहां माहौल गरम था, उन्हीं दिनों गुजरात की हुकूमत मूर्तियों से जनित प्रदूषण को चिन्ताजनक मसला मानते हुए दिशा-निर्देश जारी कर रही थी। बीबीसी न्यूज पर प्रकाशित एक समाचार ‘ एक साफ गणेश के लिए गुजरात की कोशिश’ के मुताबिक :ड्ढr भारत सरकार के केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा मूलत: तैयार यह दिशा-निर्देश, जिन्हें गुजरात सरकार द्वारा अपने हिसाब से ढाला गया, उन्हें विभिन्न जिला अधिकारियों के पास अमल के लिए भेजे गये हैं। अब के बाद गणेश की मूर्ति प्लास्टर ऑफ पेरिस से नहीं चिकनी मिट्टी से बननी चाहिये - मालूम हो कि प्लास्टर ऑफ पैरिस एक सफेद रसायनिक पाउडर होता है जो पानी में घुलने पर ठोस हो जाता है। पर्यावरणवादियों के मुताबिक प्लास्टर ऑफ पैरिस के घुलने में ज्यादा वक्त लगता है, वह पानी में ऑक्सीजन की मात्रा को भी प्रभावित करता है जिसके चलते मछलियां मरती हैं। इसके मुकाबले चिकनी मिट्टी आसानी से घुलती है और जल जीवन को प्रभावित नहीं करती। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने गणेशोत्सव के आयाजकों से यह अपील भी की है कि वे छोटी मूर्तियां बनायें जो आसानी से पानी में घुल सकें,लेकिन ये सारी बातें उस जल प्रदूषण तक ही सीमित हैं, जो इन त्योहारों में मूर्तियों के विसर्जन से होता है। त्योहारों के इस मौसम में इसी के साथ हवा को प्रदूषित करने वाली आतिशबाजी भी चलती है, जो रावण दहन से शुरू होकर दीपावली और इसके बाद तक जाती है। इस प्रदूषण की चर्चा फिर कभी। लेखक सामाजिक कार्यकर्ता हैं।ं

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  • Web Title: आस्था वही जो पर्यावरण बचाए