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महात्मा वनखंडी

महात्मा वनखंडी उदासीन सम्प्रदाय के तपस्वी और संत थे। उनका जन्म उन्नीसवीं सदी के आरंभ में, कुरुक्षेत्र (हरियाणा) के रामचन्द्र गौड़ नामक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। गौड़ दम्पती साधु-संतों की बड़ी सेवा करते थे। उनका बालक भालचन्द्र भी ऐसा ही था। उन्हीं दिनों महामण्डलेश्वर उदासीन सम्प्रदाय के साधु मेलाराम अपनी मात के साथ कुरुक्षेत्र आए। माता-पिता ने साधु मेलाराम को अपना बालक भालचन्द्र सौंप दिया। मेलाराम ने भालचन्द्र को शिष्य बनाकर दीक्षित किया। उनका नाम रखा ‘वनखंडी’। युवास्था में महात्मा वनखंडी ने तीर्थ यात्रा की और भक्ित तथा सिद्धि के अनुभव प्राप्त किए। वह उदासीन सम्प्रदाय के विचारों का प्रचार करते थे। उन्होंने मुंबई में साधु बेला तीर्थ की स्थापना की। गुरु में उनकी बड़ी निष्ठा थी। वह कहते थे -ड्ढr गुरु प्रसाद सुने जब ज्ञान, गुरु प्रसाद मिटे अज्ञान।ड्ढr गुरु प्रसाद शास्त्र को सार, वनखंडी गुरु कृपा धार।।ड्ढr वह कहते थे कि वेद साक्षात परमेश्वर की आज्ञा हैं। वेद वचन के अनुसार आचरण करने पर मुक्ित की प्राप्ति होती है। जो वेदों में श्रद्धा रखता है उसका संसार से उद्धार हो जाता है। महात्मा वनखंडी ने कहा- भगवान ही जगत है आग्र जगत ही भगवान का स्वरूप है- इस रहस्य को जिसने जान लिया वह कभी शोकग्रस्त और भयभीत न होगा। वह सदा ब्रह्मानंद में लीन रहेगा-ड्ढr हरि जगत हैं, जगत हरि, हरि जग को नहिं भेद।ड्ढr जो जानै यह ज्ञान तिहि ‘वनखण्डी’ नहीं खेद।।ड्ढr वह ‘राम नाम’ को ‘मंत्रराज’ कहते थे। वह कहते थे कि राम नाम का उच्चारण करने वाला संसार से तर जाता है- ‘जो जन बोलै राम हर, ‘वनखंडी’ संसृति से तर।’ महात्मा वनखण्डी ने आत्मा और परमात्मा की अभिन्नता को ही स्वीकार किया। वह आत्मसाक्षात्कार को ही साधना और अखण्ड आनंद की अनुभूति मानते थे-ड्ढr सत चित आनंद ईस है, नाम रूप संसार।ड्ढr मिलि पांचों यह जग बन्यो ‘वनखंडी’ नहिं पार।।

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  • Web Title: महात्मा वनखंडी