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भरत पयोधि गंभीर

अपना वनवास पूरा करने से पहले राम ने हनुमान को अयोध्या भेजा था। यह पता करने के लिए कि कहीं भरत राजपाट में रम तो नहीं गए। मकसद यह था कि अगर भरत बदल गए हों, तो राम वापस ही न लौटें। हनुमान ने लौट कर जब कहा कि भरत बेसब्री से आपका इंतजार कर रहे हैं। अगर आप समय पर नहीं पहुंचे, तो वह प्राण त्याग देंगे। तब जाकर राम ने अयोध्या लौटने का मन बनाया था। आज भरत मिलाप का दिन है। मानते हैं कि आज ही भरत का अपने राम से मिलन हुआ था। अपना राज देने के लिए बड़े भाई का इंतजार भरत ही कर सकते थे। राज छीन कर भटका देने वाले किस्से तो बहुत हैं, लेकिन किसी के नाम पर राजपाट चलाने के किस्से याद ही नहीं आते। भरत और राम अजीब हैं। एक राजा हैं, जो अपना राजपाट छोड़ कर वन में चले गए। तपस्वी हो गए। दूसर राजपाट संभाल भी रहे हैं, तो तपस्वी की तरह। अनासक्त योगी की तरह राज चलाते रहे भरत। वह तो राम के नाम पर राज चला रहे हैं। उन्हीं की खड़ाऊं रख कर। सिर्फ जिम्मेदारी निभा रहे हैं। पूर त्याग के साथ। लगाव है ही नहीं। है बस जिम्मेदारी। जनक को विदेह कहते हैं, लेकिन क्या भरत विदेह नहीं हैं? क्या चरित्र हैं भरत! किसी चीज का मोह नहीं। राजपाट का भी नहीं। उनके लिए राजपाट की साजिश हुई थी। राज उनके पास चल कर आता है, लेकिन साजिश-षडय़ंत्र का राज उन्हें नहीं चाहिए। राज करते भी हैं, तो ‘त्वदीयं वस्तु गोविंदम्’ की तर्ज पर। और समय आने पर उसे दे देते हैं। तेरा तुझको अर्पण! अगर रामराज्य कोई चीज है, तो वह भरत राज्य के बिना मुमकिन नहीं थी। भरत ने रामराज्य के लिए जमीन तैयार की थी। दरअसल, रामराज्य भरत के समय ही शुरू हो गया था। रामराज्य के लिए समुद्र-सा बड़प्पन चाहिए। वह भरत में है। शायद इसीलिए तुलसीदास कहते हैं,‘भरत पयोधि गंभीर।’ महाकवि इससे बड़ी उपमा क्या देते?

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  • Web Title: भरत पयोधि गंभीर