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राजरंग

तुझे मिरची लगी, तो मैं क्या करूं..ड्ढr जिसको जो सोचना है, सोचता रहे.. जेतना गुर्राना है, गुर्राते रहे.. नेताजी टेंशन नहीं लेते। नेताजी के सिर पर हेयर नहीं है, तो क्या हुआ, अंदर का तार तो एनी टेम खड़कते रहता है। कब किसका कागज-पत्तर जुगाड़ कर कुंडली उाागर करने लगेंगे, कोई नहीं जानता। विधानसभा में भी पिल पड़ जाते हैं। कहते हैं, चारा घोटाले के समय से ही कागज-पत्तर निकालने का एक्सपिरियेंस है। कभी अपने हनी ब्रदर के पीछे पड़ जाते हैं, कभी भूमि सुधारने वाले हुक्मरान के पीछे। मेंबरानों के कस्टोडियन को भी नहीं छोड़ते। सीडी-वीडी जुगाड़े और जांच करा दी। जांच होने पर भी जान नहीं छोड़ रहे। अब किसी को इतना परशान करंगे, तो बदले में सुनना ही पड़ेगा। जिसके पास जो खबर रहती है वह गुस्से में जाहिर कर देता है। टटका जमशेदपुर वाला मामला में भी तो यही न हुआ। बक दिये कि कोई दूध का धुला नहीं है। अब पंजा छाप वाले सदर की नजरों में भी जनाब चढ़े रहते हैं। इंडीपेंडेंट लोग तो नामे सुनते फायर होने लगता है : जो -सो बिना दम तथ्य वाला कागज निकालकर तितकी लगाता है ई मानुष। और ये जनाब जब-तब पेपर लीक करते रहते हैं : कुछ इसी अंदाज में, तुझे मिर्ची लगे, तो मैं क्या करूं..।

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