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राजरंग

आंखों में नींद ना दिल में..तकदीर कमजोर रूम में नहीं स्ट्रांग रूम में बंद हुई है। का होगा, का नहीं होगा, इसी माथापच्ची में जे लड़ल था, पड़ा हुआ है। जिनकी जमानत जब्त होनेवाली है, वे भी एक लाख वोट से जितने की उम्मीद लगाये बैठे हैं। इधर सुंदर बुद्धि भाई टहलते टहलते टहल भाई के इलाके में अपना हाल जानने पहुंच गये। इतने में चौधरी जी भी आ गये। भले महीना भर एक दूसर के खिलाफ आग उगले हों, लेकिन दोनों में इतनी कट्र्सी जरूर थी कि दोनों पूछ बैठे तोर का होतउ बाबा। टहल भाई काहें पीछे रहते। वह पूछे आपन पहिले कहहीं ना। एक-दूसर को बधाई भी देते हैं। यह भी कहते हैं। एतना लंबा दिन रखने का क्या काम था। ना आंखों में नींद है ना दिल में करार। बहुत मेहनत हुआ है। पैसा भी ढेर खर्चा हुआ है। जल्दी गिनती हो जाती, भले कोई जीतता, दिल की बेचैनी तो खत्म हो जाती। भइयवन सब अभी भी नहीं छोड़ रहा है। कहता है भइया जी आप तो भारी वोट से आगे निकल रहे हैं। अब भी तो खर्चा पानी करिये। जीत के दिल्ली चल जाइयेगा, तो फिर कहां भेंटाइयेगा। सांत्वना देने के बाद भी सब नहीं मानता है। खर्चा करवाने पर उतारू है। अब तक तो नस की एक-एक बूंद निकल गयी है। फिर भी नहीं मानता। टहल भाई जवाब देते हैं भाई जी, हम तो हाथ दाब के चले हैं, इसलिए डर भी लगता है। देखिये ऊपर वाला क्या गुल खिलाता है।

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