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अपने हिस्से की धूप

बहुत दिनों से हम सोच रहे हैं। धूप और हवा कुदरत की मुफ्त की नियामत है। यह कैसा समाजवाद है कि इन तक में इंसान-इंसान में बराबरी नहीं है। कभी-कभी लगता है कि ऊपर वाले का इंसाफ में यकीन नहीं है। जन्म की दुर्घटना कभी किसी झुग्गी में होती है, कभी कोठी में। एक के पास खाने को नहीं है, दूसर के पास चुनने की दिक्कत है। क्या खाए, क्या नहीं। ऊपरवाले की नाइंसाफी कोई झेल भी ले, आदमी भी अपनी हरकतों से कब बाज आता है? एक भूखे को आरक्षण का झुनझुना दे देता है, दूसर को ऊंची जाति का होने की सजा। सबको रोटी का मौका मुश्किल है, इतिहास के अन्याय को मिटाना आसान! सत्ता प्रजातंत्र की हो या एकतंत्र की। इस लंका में संत नहीं, सिर्फ राक्षस बसते हैं। वह नई-नई जुगत भिड़ाते हैं, जनता के वोट हथियाने को। जाने क्यों, ऐसे विध्वंसक विचार हमें महीने के अंत में ही आते हैं। वह भी उसी दिन जब जेब खाली हो और हम उठते ही अखबार की जगह अपना या पत्नी का चौखटा देख लें। अब हमें यकीन हो चला है। समाजवाद, माक्र्सवाद या पूंजीवाद सब भर पेट और जेब के चोंचले हैं। भूखे का भजन सिर्फ रोटी है। यह सच है कि अपने दड़बे में धूप का प्रवेश वर्जित है। गर्मियों भर हम दूसरों को इसे अपनी व्यक्ितगत उपलब्धि की तरह पेश करते हैं। हालांकि सारा श्रय उस रईस बिल्डर को है जो इन बहुमंजिली दड़बों का निर्माता है। हम शान से बताते हैं सबको कि खुद-बखुद वातानुकूलित है अपना घर। बस, एक दो पंखों से काम चल जाता है। यह दीगर है कि कभी दाल का छौंक, तो कभी प्याज का तड़का दिन भर गमकता रहता है घर में। जाड़ा आते-आते अपने मन का आधा भरा गिलास, आधा खाली नजर आता है। शाम होते-होते पत्नी खांसती-ठिठुरती है, हम बिल्डर को कोसते हैं। अपने हिस्से की धूप पर सबका पैदाइशी हक है। हमें उससे ही महरूम कर दिया है इस कम्बख्त बिल्डर ने। जानें क्यों धूप के अभावग्रस्त पीड़ित आंदोलन क्यों नहीं छेड़ते हैं, इस बिल्डर के खिलाफ। अचानक हमार मन में सामने की झुग्गी की उस पढ़ी-लिखी लड़की का चित्र कौंधता है, जो नौकरी की खातिर धन-कौमार्य गंवाकर विक्षिप्त-सी हो गई है। सूनी आंखों के साथ चुप बैठी रहती है वह। इस शांतिप्रिय देश के लोग भूख, भ्रष्टाचार, आतंक और अन्याय तक से उद्वेलित नहीं हैं। धूप के अभाव से मामूली मसले में दम ही क्या है, जब भोजनविहीन तक मौन हैं। चीखना-चिल्लाना, शिकायत करना, समृद्ध का अधिकार है, निर्धन का नहीं।

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  • Web Title: अपने हिस्से की धूप