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फिर राजनीति का अड़ंगा

रायबरली में रलवे कोच फैक्ट्री न बनने से आरोप-प्रत्यारोपों का सिलसिला तो बनेगा, लेकिन यह तय है कि इससे उत्तर प्रदेश के औद्योगीकरण को धक्का पहुंचेगा। औद्योगीकरण की दौड़ में उत्तर प्रदेश बहुत पिछड़ रहा है और बड़े निजी उद्योगों के लिए ज्यादा आकर्षक स्थितियां दूसरे कई राज्यों में हैं। ऐसे में एक बड़े सरकारी कारखाने के आने से और उसके आसपास कुछ सहायक उद्योगों के पनपने से उत्तर प्रदेश के लोगों को उद्योगों से आने वाले विकास और रोगार की उम्मीद हो सकती थी, लेकिन ऐन वक्त पर जमीन देने से हाथ खींच कर उत्तर प्रदेश सरकार ने यह उम्मीद छीन ली। जाहिर है सोनिया गांधी के चुनाव क्षेत्र को इतनी बड़ी परियोजना मिलने के पीछे भी कुछ राजनैतिक इरादे तो रहे ही होंगे और उससे जमीन न देने के पीछे भी राजनीति ही है, लेकिन विकास और रोगार के मामलों में राजनति न आए तो ही बेहतर होता है। इसका एक प्रत्यक्ष उदाहरण सिंगुर है, जहां राजनैतिक कारणों से ही जमीन के मामले पर समझौता नहीं हो पाया और पश्चिम बंगाल से एक ऐसी परियोजना चली गई जो राज्य के औद्योगीकरण का आधार हो सकती थी। सरकारी कोच फैक्ट्री को लेकर सिंगुर जसा विवाद भी नहीं है, हालांकि उत्तर प्रदेश सरकार ने जमीन न देने के पीछे असंतोष और विवाद की आशंका बताई है। यह जमीन सिंगुर की तरह उपजाऊ नहीं, बल्कि बंजर और परती जमीन है, जिस पर उद्योग लगने से उसका सदुपयोग ही होता। कांग्रेस और बसपा के राजनैतिक रिश्ते इन दिनों बेहद खराब हैं और फिलहाल उनके सुधरने की बहुत उम्मीद नजर नहीं आती क्योंकि आने वाले चुनावों में इन दोनों पार्टियों के हित परस्पर विरोधी हैं, लेकिन विकास में सबके दूरगामी हित हैं, भले ही फौरी राजनीति में उसका विरोध करना फायदेमंद हो। जाहिर है किसी भी प्रदेश का पिछड़ा और अविकसित रहना उस प्रदेश के हुक्मरानों के लिए बोझ ही बनेगा। यह तो सरकारी कारखाना था, जिसकी मालिक सरकार और प्रकारांतर से राजनीति है, लेकिन निजी क्षेत्र के लिए तो यह एक संकेत होगा कि इस राज्य में उद्योग लगाना खतरनाक हो सकता है। इस वक्त जब तमाम राज्यों में औद्योगीकरण को लेकर कड़ी प्रतिस्पर्धा है, इस तरह का संकेत अच्छा नहीं है। साथ ही यह वक्त समाधान खोजने का है। ऐसा रास्ता निकालने का ताकि इस तरह की राजनीति शुरू ही न हो।

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