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दो पटरियों पर विचार

एक ट्रेन को लखनऊ जाना था और इलाहाबाद पहुंच गई, या इलाहाबाद जाना था और लखनऊ पहुंच गई। जब रलवे विभाग और ट्रेन ड्राइवर को ठीक-ठीक पता नहीं तो और लोगों को क्या पता होगा? वैसे यह उम्मीद रलवे विभाग से रही है कि कहीं की ट्रेन को कहीं पहुंचा दे। एयर लाइंस अक्सर यात्रियों का सामान कहीं से कहीं पहुंचाती रहती है, यानी लंदन जाना है तो उसका सामान ब्रुसेल्स पहुंच जाता है, यात्री टोकियो में पहुंच कर अपने सामान का इंतजार करता है और सामान मेलबर्न पहुंच जाता है। रलवे विभाग ने एक पूरी ट्रेन ही कहीं से कहीं पहुंचा दी, लखनऊ जाना था और इलाहाबाद पहुंच गई। हो सकता है यह कोई गड़बड़ी न हो सिर्फ मतभेद का सवाल हो। यानी रलवे विभाग की राय हो कि रल को अमुक जगह जाना चाहिए और ड्राइवर की राय में किसी दूसरी जगह पहुंचना जरूरी हो। ऐसा होता है, डॉ. मनमोहन सिंह कुछ चाहते हैं, अजरुन सिंह कुछ और चाहते हैं, शिवराज पाटिल कुछ और चाहते हैं, डॉ. रामदास कुछ और चाहते हैं, लालू जी कुछ और चाहते हैं। ऐसे में ट्रेन या तो खड़ी रहती है या जिसकी चल जाए उसकी ओर चल देती है। लेकिन समस्या यह है कि पटरियों की तरह दिशाएं भी कुछ ही हैं, आपको पटरियों की दिशा में ही जाना है, भले ही आप जाना चाहें या न चाहें। जसे आजकल दो लाइनें चल रही हैं, पहली लाइन यह है कि अल्पसंख्यक देश को तोड़ रहे हैं, और उन्हें जो तोड़ रहे हैं, वे देशभक्त हैं। दूसरी लाइन यह है कि जो आतंकवाद के खिलाफ हैं, वे अल्पसंख्यकों के खिलाफ हैं। यानी हम कह सकते हैं कि पहली लाइन दूसरी लाइन के ठीक उलट है कि जो अल्पसंख्यकों के खिलाफ हैं, वे आतंकवाद के खिलाफ हैं। तीसरी लाइन बनी नहीं या बनने नहीं दी गई कि हम आतंकवाद के खिलाफ हैं और अल्पसंख्यकों के पक्ष में हैं। अब दिक्कत यह है कि ट्रेन लखनऊ जाएगी या इलाहाबाद यह ड्राइवर और रलवे विभाग का झगड़ा है, जो भी चला ले उसकी चलेगी। यात्रियों को कोई नहीं पूछ रहा कि भाई तुम्हें कहां जाना है। यानी जिनके पास टिकट नहीं है वे तय कर रहे हैं और जो टिकट खरीदकर बैठे हैं, उनसे कोई पूछ नहीं रहा है। दो पार्टी सिस्टम की तरह दो विचार सिस्टम बन रहा है। या तो आप इधर हैं या उधर हैं, जसा कि जॉर्ज बुश ने कहा था। उन्हें दो से ज्यादा विचार समझ में नहीं आते, फिर भी वे मतभेदों की अराजकता फैला रहे हैं। मत कम और मतभेद ज्यादा।

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