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26 जनवरी, 2020|10:57|IST

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पेप्सिकचचो 3300 नौकचचरियां खत्म कचचरेगी

पेप्सिको अगले तीन वर्षो में 3300 नौकरियों को समाप्त करेगी। यह आंकड़ा कंपनी के कर्मचारियों की संख्या का 1.8 प्रतिशत है और ऐसा करके वह 1.2 अरब डॉलर से अधिक राशि बचा सकेगी। वैश्विक आर्थिक मन्दी से कंपनी का शीतल पेय और खानपान कारोबार बुरी तरह प्रभावित हुआ है और उसके शेयरों में लगभग 12 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है। इससे पहले उसके शेयरों में 13.8 प्रतिशत गिरावट आई थी जो 1े बाद की दूसरी बड़ी गिरावट थी। कंपनी की मुख्य कार्यकारी अधिकारी इंदिरा नूई ने बताया कि वैश्विक मंदी के चलते लोगों ने फिजूल खर्ची पर रोक लगाते हुए रेस्तरां में जाना बन्द करने के साथ-साथ घूमना- फिरना भी काफी कम कर दिया। घरों और मकानों की कीमतों में जोरदार गिरावट, पूंजी की कमी और नौकरियों में कटौती और बदलती जीवन शैली से शीतल पेय कारोबार प्रभावित हुआ है और लोग बोतलबन्द की जगह साधारण पानी की तरफ मुड़ गए। उन्होंने बताया कि पिछले 12 से 18 महीनों में हालत बहुत ही अभूतपूर्व रही है और अभी यह कह पाना मुश्किल है कि बाजार किस तरफ जा रहा है। उधर, अगले साल के अंत तक लंदन के बैंकों में 62,000 नौकरियों की कटौती देखने को मिल सकती है। सेंटर फॉर इकोनॉमिक्स एंड बिजनेस रिसर्च के मुताबिक यह पिछले दशक का रोगार का सबसे न्यूनतम स्तर होगा। रिपोर्ट के मुताबिक आर्थिक संकट के कारण फर्मो को अपने खर्च कम करने के लिए नौकरियों में कटौती जसे कदम उठाने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। दुनियाभर में वित्तीय संकट एक वायरस की तरह फैला है और उसने लगभग सभी को अपनी चपेट में ले लिया है। अकेले लंदन शहर में इस वर्ष 28,000 नौकरियों की कटौती हो सकती है तो अगले वर्ष यह आंकड़ा 34,000 को छू सकता है। सीईबीआर के सीनियर इकोनॉमिस्ट रिचर्ड ब्रुक के मुताबिक आर्थिक मोर्चे पर पटरी से उतरी गाड़ी को रास्ते पर आने में अभी काफी वक्त लगेगा। 2006-07 के वक्त की सम्पन्नता और समृद्धि के फिर से बहाल होने की उम्मीद पालना फिलहाल मुनासिब नहीं लगता। दुनियाभर में बैंक क्रेडिट संकट से निपटने के लिए अपनी डील्स को खत्म कर रहे हैं और कॉस्ट कटिंग के लिए नौकरियों में कमी कर रहे हैं। लंदन स्थित एक रिक्रूटमेंट एजेसी के मालिक का कहना है कि यह दौर कम से कम दो साल तक चलने की उम्मीद है। जहां पहले तीन लोगों की वेकेंसी थी वहां पर अब कंपनी तीन का काम करने वाले एक व्यक्ित की खोज में लगी है। अमेरिका में मंदी की मार झेल रही न्यूजपेपर इंडस्ट्री ने भी कागज की बढ़ती कीमतों, कम होती कमाई और कर्मचारियों के वेतन की भरपाई के लिए अपनी तरफ से कॉस्ट कटिंग की खातिर कई कदम उठाए हैं। किसी पेपर ने अपने एडीशन का साइज कम किया है तो किसी ने पन्ने कम किए हैं लेकिन अमेरिकी शहर कनसास में छपने वाले अखबार मैकफर्सन सेंटिनल ने तो सोमवार के अंक को ही ड्रॉप करने का फैसला कर लिया है। गेटहाउस मीडिया इंक के मालिकों का इस बार में कहना है कि इस कदम को ठीक उसी तरह से लिया जाना चाहिए जसे कोई कंपनी अपने प्रोडक्ट के पैकेट का साइज छोटा कर दे या अपनी च्युइंग गम पर चल रही किसी स्कीम को वापस ले ले। प्रकाशन समूह का कहना है कि कर्मचारियों की छंटनी करने से बेहतर उन्हें यह लगा कि वे एक दिन का अंक ही ड्रॉप कर दें। प्रिंट मीडिया पर एक तरफ तो महंगे कागज का बोझ है दूसरी तरफ सकरुलेशन कम हो रहा है। ऊपर से विज्ञापनदातों की उपेक्षा के चलते कमाई कम होती जा रही है। अमेरिकी न्यूजपेपर एसोसिएशन के मुताबिक दूसरी तिमाही में एड रिवेन्यू में 16 फीसदी की रिकॉर्ड गिरावट देखी गई है। इसी तर्ज पर सोमवार का अंक बंद करने वालों में डेविडसन में द डिस्पैच, नॉर्थ कैरोलिना में काउंटी, इलिनॉस शहर का डेली रिव्यू एटलस, स्टॉर कुरियर और फीनिक्स का ईस्ट वैली ट्रिब्यून शामिल हैं। यही नहीं मियामी हेराल्ड ने अपने डिविडेंड में कटौती की है और अब नौकरियों में कटौती की बात पर विचार चल रहा है। न्यूयार्क टाइम्स और न्यूज कॉर्प का वॉल स्ट्रीट जरनल भी कम पेज छाप रहा है। जहां दुनियाभर के पैसे वाले लोग बेशक अपनी शानदार गाड़ियों के काफिले में कटौती कर रहे हैं वहीं भारत में लगरी कारों के विक्रेता सस्ती ब्याज दर का दाना डाल कर कारोबार बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं। बाहर की मंदी का भार कम करने और बिक्री बढ़ाने के लिए लगरी कार कंपनी बीएमडब्ल्यू ने अपनी कारों के लिए आकर्षक फाइनेंस स्कीम शुरू की है। बाजार में ग्राहक को वापस लाने के लिए बीएमडब्ल्यू ने कारों पर चल रही 14-17 प्रतिशत की ब्याज की मौजूदा दर के बदले 5.38 प्रतिशत की ब्याज दर वाली स्कीम शुरू की है। कंपनी यह स्कीम अपनी बीएमडब्ल्यू 3 सीरीा पर दे रही है। इस सीरीा की कार की कीमत 27 से 30.70 लाख के बीच है। कुछ कस्टमर्स के लिए जीरो डाउन पेमेंट का विकल्प भी दिया जा रहा है। मीडिया और एडवरटाइजिंग की दुनिया के आर्थिक संकट का असर भारत में कई कारपोरट्स के मीडिया और एडवरटाइजिंग बजट पर देखने को मिल रहा है। प्रमुख एयरलाइन्स, रिटेलर्स और फाइनेंशियल ब्रोक्रेा फर्मो ने अपने बजट में अच्छी खासी कटौती की है। यही नहीं पारले प्रोडक्ट्स ने भी अपने एड बजट में 20 फीसदी तक कटौती की योजना बनाई है। मामले के जानकार बताते हैं कि कंपनियों ने अब विज्ञापन के लिए लांग-टर्म योजना बनाने के बदले छोटी अवधि के लिए प्लान बनाने शुरू कर दिए हैं। हालांकि कुछ एक्सपर्ट मानते हैं कि मंदी का असर विदेश की तुलना में भारत में कम होगा। एफएमसीजी और टेलीकॉम सेक्टर अभी इस दिशा में फैसला लेने पर कतरा रहे हैं। इस मुद्दे पर एक प्रमुख एजेंसी का कहना है कि उसके ज्यादातर क्लाइंट वित्तीय बाजार पर नजर रखे हुए हैं। एक अग्रणी मीडिया एजेंसी ने जून में छापी रिपोर्ट में दिए गए 2008 में दुनियाभर में विज्ञापन खर्च के अनुमान को 6.6 प्रतिशत से घटाकर अब 4.3 कर दिया है। मंदी के रोग ने दवा उद्योग को भी पकड़ना शुरु कर दिया है। दुनियाभर में जेनरिक दवाओं का व्यापार करने वाली आइसलैंड की फार्मा कंपनी एक्टाविस को मदद की दरकार है। खबरं आ रही हैं कि एक्टाविस ने एक बैंक और एक भारतीय कंपनी से बात चला रखी है जो वित्तीय संकट से उबारने के लिए उसकी हिस्सेदारी खरीदने में इच्छुक है। एक्टाविस दुनिया की पांच बड़ी जेनरिक दवाओं की निर्माताओं में से एक है। हालांकि कंपनी ने इस बात से इनकार किया है कि देश के आर्थिक संकट का असर उस पर पड़ेगा। कंपनी के मुताबिक केवल एक फीसदी रिवेन्यू आइसलैंड से मिल रहा है। कंपनी ने कहा कि उसकी जडें़ देश से बाहर काफी मजबूत हैं और उसकी बुक्स यूरो में हैं आइसलैंडिकक्रोना में नहीं। इस करंसी में 7 अक्तूबर को यूरो के मुकाबले 45 फीसदी की गिरावट देखी गई थी। भारत में एक्टाविस से करीब 620 कर्मचारी कार्यरत हैं।ं

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