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इंसान बनो

सहसा बहुत पहले सुने एक फिल्मी गीत की पंक्ित दिलोदिमाग में हलचल मचाने लगी, ‘इंसान बनो कर लो भलाई का कोई काम।’ सीधे सरल शब्दों में कही गई यह बात आज के संदर्भ में कितनी गहरी और सही लगती है। आज देश-विदेश सब जगह केवल हिंसा का नाच हो रहा है। आतंकवाद हो या सांप्रदायिक दंगे- एक ही हिस्से के दो पहलू हैं। दोनों धर्म की दुहाई देते हैं और दोनों हिंसा में विश्वास करते हैं। सभी धर्मो के अनुसार प्रभु मनुष्य को दूसर के बार में सोचने वाला, दयालु, परोपकारी बनाते हैं। क्योंकि सभी धर्म मानते हैं कि ऐसा न करने वाला नरक जाता है। आम आदमी सहअस्तित्व में सुख पाता है, समय आने पर दूसर धर्म वालों की प्राण रक्षा अपना कर्तव्य समझता है। तो यह कौन सा धर्म है जो मारकाट पर निर्भर है? धर्म की यह नई परिभाषा क्या दरिंदगी फैलाने के लिए गढ़ी गई है? एक वर्ग डरता है कि उसके धर्म का अंत हो जाएगा, दूसरा उसके अपमान का बदला लेना चाहता है। दोनों अपने धर्म के लिए हिंसा फैलाते हैं, जबकि कराहता हुआ धर्म चीख-चीख कर बताना चाहता है कि ‘मुझे कोई खतरा नहीं है। मैं युगों से तुम लोगों के बचाव के बिना जिया हूं और जीता रहूंगा। अर, तुम्हारी हरकतें मुझे शर्मिदा कर रही हैं, मैं अपने ही साथियों से आंख मिलाने में झिझक रहा हूं। ऐसा मत करो।’ पर धर्म के ठेकेदार उसकी अनसुनी कर खून की नदियां बहाते जा रहे हैं। इंसान नैतिकता प्रेमी और करुणापूर्ण रहा है। पर आज अपने को शिक्षित और सभ्य समझने वाले लोग पाषाण युग की बर्बर प्रवृत्ति को अपना रहे हैं। कभी धर्म के नाम पर तो कभी आत्मसम्मान के लिए, आज हत्या करना एक खेल बन गया है। यह विकास का नहीं, अवरोध का सूचक है। एक भी ऐसी घटना संपूर्ण मानवता को शर्मिदा करती है। धर्म और आस्था के उदार रूप को अपनाओ, इंसान बनो, भक्त नहीं प्रभु तुम्हार काबू में आ जाएंगे।ं

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