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भ्रष्टाचार की सबसे गहरी चोट गरीब पर

वह बैठी हुई थी। उसके चेहर पर सौ सालों की चिंताओं की लकीरं साफ नजर आ रही थीं। सरस्वती देवी नामक यह विधवा महिला दक्षिणी बिहार में नालंदा जिले के सिकन्द्रा गांव में रहती है। उसकी कहानी असाधारण तो नहीं है, लेकिन जब आप उसकी आपबीती सुनेंगे तो आपकी आंखों से भी आंसू टपक पड़ेंगे, क्योंकि इस असहाय महिला ने बहुत सार दु:ख-दर्द झेले हैं। सरस्वती देवी से मैंने पूछा- उसकी पंचायत की मुखिया वीना देवी ने महिलाओं के लिए क्या-क्या काम किए हैं, जो उसी गांव में रहती है? मेरी उससे बातचीत के दौरान लगभग एक दर्जन महिलाएं दरवाजे पर खड़ी-खड़ी या शरीर के ऊपरी हिस्से को आगे झुकाते हुए झांककर देख रही थीं। उसने बताया- मुझे पता नहीं था कि मैं सरकारी पेंशन की हकदार हूं। वीना देवी ने ही इस बार में मुझे बताया था और मुझे पेंशन पाने में मदद की। इस पर मैंने पूछा- तो क्या अब उसे पेंशन मिल रही है। उसने कहा- हां, मिल रही है, लेकिन पेंशन पाने के लिए थोड़ी दूरी पर स्थित पोस्ट ऑफिस में जाना पड़ता है। इसके लिए जो भी परिवहन साधन उपलब्ध हो जाए, उसमें बैठकर वह वहां पहुंचती है। 100 रु. की उसकी पेंशन में पोस्टमैन 10 रु. काटकर शेष राशि उसे दे देता है। उसने बेझिझक होकर बताया कि 10 रु. की यह कटौती पेंशन देने के पोस्टमैन के कार्य की एवज में ‘फीस’ के रूप में होती है। जब मैंने सरस्वती देवी को बताया कि गाड़ी में सफर कर उसे पोस्ट ऑफिस तक जाने की जरूरत ही नहीं है, क्योंकि यह पोस्टमैन की डय़ूटी है कि वह उसके गांव में आकर उसे पेंशन दे। इस बात पर उसे यकीन ही नहीं हुआ था और उसने कहा- तब पोस्टमैन 15 रु. काट लेगा। सरस्वती देवी जसी लाखों गरीब महिलाएं होंगी, जिन्हें यह पता नहीं है कि वे किसी पेंशन की हकदार हैं या पेंशन की पूरी राशि उन्हें मिलनी चाहिए। इसके लिए पोस्टमैन पर दोष नहीं मढ़ा जा सकता। वह भुगतान की लागत वसूलने के लिए यह करता है, जिसे संभवत: अन्य स्तर पर उसे चुकाना पड़ता है। भ्रष्टाचार की लागत वसूलने के लिए प्रत्येक व्यक्ित वसूली की कोशिश कर रहा है। लेकिन, अंतत: जो व्यक्ित इसकी कीमत चुकाता है, वह सरस्वती देवी जसा गरीब तबके का सबसे कमजोर व्यक्ित होता है। बेशक, देश में इस तरह के उदाहरण कई जगह मिल जाएंगे। हमारी जिंदगी के प्रत्येक क्षेत्र में भ्रष्टाचार की जड़ें जितनी गहरी पैठ जमा चुकी हैं, उसे देखते हुए हमें बिहार की यात्रा पर जाने की जरूरत ही नहीं है। असल में, भारतीय अर्थव्यवस्था के विस्तार के साथ भ्रष्टाचार का दायरा भी साल-दर-साल फैलता जा रहा है। ट्रांसपेरंसी इंटरनेशनल के 2008 के सव्रेक्षण के मुताबिक कम भ्रष्ट देशों में भारत की रैंकिंग 72 से गिरकर 85 पायदान पर पहुंच गई है। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम ने आकलन किया है कि भारत की जीडीपी ग्रोथ (सकल घरलू उत्पाद में वृद्धि) में भ्रष्टाचार एक चौथाई की कटौती कर देता है। इस तरह के तथ्यों से यह भी स्पष्ट होता है कि भ्रष्टाचार गरीबों पर सबसे गहरी चोट करता है, क्योंकि राज्य (सरकार) की अनुकंपा पर वे पूरी तरह आश्रित होते हैं। सरस्वती देवी की कहानी के अलावा भ्रष्टाचार की लागत के बहुत सार उदाहरण मिल जाएंगे। सिकन्द्रा गांव के नजदीक लोहारपुर गांव है, जहां लगभग 400 परिवार रह रहे हैं। गांव की बहुसंख्यक जनसंख्या दलित समुदाय और अत्यंत गरीब वर्ग की है। गांव में एक प्राइमरी और मिडिल स्कूल है। उसी मुखिया वीना देवी ने विकास कार्य के लिए मिलने वाले फंड्स का इस्तेमाल स्कूल के लिए अतिरिक्त इमारतों के निर्माण में किया। स्कूल में 500 से भी अधिक छात्र होने के बावजूद प्रिंसीपल सहित सिर्फ चार अध्यापक हैं। जिस दिन हमने स्कूल का दौरा किया, उस समय निकटवर्ती 20 स्कूलों की स्थिति जांचने आया एक इंस्पेक्टर भी मौजूद था। मैंने उससे पूछा कि प्राइमरी स्कूल के छात्रों को दिए जाने वाले मिड-डे मील (दोपहर का भोजन) की क्या स्थिति है? इंस्पेक्टर और प्रिंसीपल दोनों ने स्वीकार किया कि लगभग एक साल से छात्रों को गरम भोजन नहीं मिला है। लेकिन, क्यों? इस सवाल के जवाब में उनका कहना था कि इसकी सप्लाई नहीं की जाती है। इंस्पेक्टर ने माना कि उसके अधीन आने वाले 20 स्कूलों में से अधिकतर में पिछले एक साल से छात्रों को मिड-डे मिल नहीं दिया गया है। इस बीच हमारी यह चर्चा सुन रहे बच्चों के अभिभावक बेहद क्रोधित हो उठे और चिल्लाने लगे। उन्होंने स्कूल के इन्चार्ज पर अनाज की हेराफेरी करने का आरोप लगाया। हर किसी को मालूम है कि सप्लाई नहीं की जाती है, यह तो मात्र एक बहाना है और हकीकत में यह सप्लाई कहीं और या किसी अन्य व्यक्ित के किचन में इस्तेमाल की जाती है। इस तरह के मामले में भी वे सबसे कमजोर बच्चे कुप्रभावित होते हैं, जिनके लिए दिन में एक कटोरा खिचड़ी खाने को मिल जाना समुचित भोजन के समान होता है और दुर्भाग्यवश वे भ्रष्टाचार का खामियाजा भुगतते हैं। बिजली का क्या हाल है? लोहारपुर और सिकन्द्रा दोनों गांवों में बिजली व्यवस्था होनी चाहिए। आपको वहां बिजली के खंभे जरूर नजर आएंगे, लेकिन बिजली नहीं है। मुझे बताया गया कि कुछ बार चंद मिनटों के लिए बिजली आती है और यदा-कदा कुछ घंटे सप्लाई की जाती है। इस बीच बीपीएल परिवारों (गरीबी रखा से नीचे जीवन गुजर-बसर करने वाले) के लिए दिए जाने वाला केरोसिन उन्हें नहीं मिलता, क्योंकि यह उन जनरटर पंपों के मालिकों को दे दिया जाता है, जो उसे महंगे दामों पर खरीद सकते हैं। इस प्रकार, प्रतिदिन महिलाएं अपना चूल्हा जलाने के लिए लकड़ियां बटोरती हैं और बाकी देश में हम ऊरा की कमी पर बहस करते रहते हैं। इन गांवों में ऊरा की स्थिति हमार महानगरों की दुनिया से एकदम अलग है। इन गांवों की समस्याओं पर हतोत्साहित महसूस करना आसान है, लेकिन कोई समाधान ढूढ़ना बेहद कठिन। फिर भी, मैं आशावादी हूं क्योंकि तमाम कठिनाइयों के बावजूद लोहारपुर और सिकन्द्रा गांव के बच्चे अपार उत्साह के साथ पढ़ाई कर रहे हैं। और, वीना जसी दृढ़ संकल्प वाली महिला मुखिया मौजूद है, जो सभी बाधाएं पार करते हुए लोगों की भलाई का काम कर रही है। मेरा मानना है कि जब तक हमारी व्यवस्था ऐसी हस्तियों को पैदा करती रहेगी, तब तक उम्मीद कायम रहेगी। लेखिका स्वतंत्र पत्रकार हैं।

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