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झारखंड में जमीन बचान की लड़ाई

झारखंड सरकार एवं औद्योगिक घरानों के बीच अब तक 74 स्टील फैक्ट्री एवं 24 पावर प्रोजेक्ट के लिए एमओयू पर हस्ताक्षर हो चुके हैं, जिससे राज्य में 4,67,240 करोड़ रुपये का निवेश होगा तथा इसके लिए लगभग 2 लाख एकड़ जमीन की जरूरत है। सरकार उद्योगपति एवं मीडिया, लोगों को यह समझाने में लगे हैं कि औद्योगिकीकरण ही झारखण्ड के विकास का एक मात्र रास्ता है, इसलिए वे उद्योगों को अपनी जमीन दे दें, जिससे लोगों को नौकरी एवं राज्य की अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी। लकिन आदिवासी एवं मूलवासी इससे मानन को तैयार नहीं हैं, क्योंकि उनमें से 70 प्रतिशत लोग अपनी जीविका के लिए कृषि एवं वन पर अश्रित हैं। उन्होंने विस्थापन का दर्द देखा है। इसलिए वे विस्थापन के खिलाफ गोलबंद हो रहे हैं, उद्योगों पर हमला कर रहे हैं तथा उनके कर्मचारियों को गांवों में घुसने नहीं दे रहे हैं। फलस्वरूप पिछले 5 वर्षों में एक भी एमओयू को जमीन में नहीं उतारा जा सका है। एक अक्तूबर को ग्रामीणों ने जमशेदपुर के समीप कोहिनूर स्टील पर हमला किया, 70 ट्रकों को रोक कर फैक्ट्री में काम बंद करवा दिया था। उनका आरोप है कि कोहिनूर स्टील ने जमीन लेन के बाद वाद के अनुसार मुआवजा और नौकरी नहीं दी तथा फैक्ट्री के प्रदूषण से गांव में फसल नहीं होती है, पानी पीने लायक नहीं है तथा लोगों के स्वास्थ पर इसका गंभीर असर पड़ा है। 11 सितंबर को पाटका में भूषण स्टील के तीन सर्वेयरों को ग्रामीणों ने सरमंदा नदी केके पास जमीन नापते समय पकड॥कर उनके चेहरे पर कालिख पोत दी, गोबर खिलाया एवं जूतों का माला पहनाकर गांवों में घुमाया। रोलाडीह गांव की सोमरी हेम्ब्रम घटना को सही ठहराते हुए कहती हैं, ‘हमलोगों ने घोषणा कर दी है कि उद्योग के लिए जमीन नहीं देंगे, उसके बावजूद ये लोग बिना सूचना दिये जमीन नाप रहे थे, इसलिए उन्हें सबक सिखाया गया’।लेखक मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं)

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