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मंदी के दौर में सरकारी आईपीओ की आस

देश में शेयर बाजार में जारी जबरदस्त गिरावट के मद्देनजर अधिकतर वित्तीय संस्थानों का मानना है कि निवेशकों का विश्वास जीतने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को अपने प्रारंभिक सार्वजनिक निर्गम (आईपीआे) बाजार में लाने चाहिए। गौरतलब है कि शुक्रवार को 30 शेयरों का सूचकांक वर्ष 2006 से अब तक की सबसे बड़ी 606 अंकों की गिरावट के बाद अंकों पर आ गया था। दस हजार के आंकड़े से जनवरी 2008 में 21 हजार पर आने के लिए शेयर बाजार को दो वर्ष से अधिक का समय लगा, लेकिन इतनी गिरावट के लिए उसने मात्र तीन हफ्ते का समय लिया। भारतीय वाणिय उद्योग मंडल (फिक्की) ने लगभग 300 मुख्य वित्तीय अधिकारियों के साथ एक सर्वेक्षण में यह निष्कर्ष निकाला। भारतीय पूंजी बाजार इस समय वास्तविक संकट का सामना नहीं कर रहा है, बल्कि यहां विश्वास का संकट है। इनमें से लगभग 1वित्तीय अधिकारियों का मानना है कि अधिकतर निवेशकों को अभी भी सार्वजनिक उपक्रमों पर ही भरोसा है और एक मात्र विकल्प यही है कि आईपीआे लाने के लिए इन उपक्रमों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। इनका कहना है कि वर्ष 2002 में जब घरेलू व्यावसायिक बाजार में निवेशक बुरी तरह हताशा में थे तो मारुति सुजुकी अपने आईपीआे लाई थी और निवेशकों ने उसे हाथों हाथ लिया था। लगभग 175 वित्तीय अधिकारियों का कहना है कि बाजार की उठापटक और निवेशकों का हाल देखते हुए नेशनल हाइड्रोपावर कारपोरेशन और तेल कंपनियों को अपने आईपीआे बाजार में उतार कर पूंजी जुटानी चाहिए, क्योंकि निवेशक अब सुरक्षित निवेश की तलाश में हैं, हालांकि इन उपक्रमों को आईपीआे बाजार में उतारने की अनुमति मिल चुकी है, लेकिन इनका मूल्य तय करने का मामला मंत्रालय में लटका हुआ है।

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