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चंद्रयान-1 में लीथियम बैटरी का क्या काम

चंद्रयान-1 को चांद की कक्षा में अपने कार्यकाल के दौरान बिजली संकट का भी सामना करना पड़ सकता है। ऐसा तब होगा जब चंद्रयान को सूर्य की रोशनी नहीं मिल पाएगी। वैज्ञानिकों को इसका अहसास है। इसके लिए इसमें लिथियम बैटरियां भी भेजी जा रही हैं। दरअसल श्रीहरिकोटा से प्रक्षेपण के साढ़े पांच दिन बाद चंद्रयान चांद से 100 किमी की ऊंचाई पर जैसे ही कक्षा में स्थापित होगा, इसका सोलर पैनल कार्य करना आरंभ कर देंगे। यही सोलर पैनल उपग्रह को संचालित रखेगा और उसकी मूवमेंट तथा इसमें लगे उपकरणों को बैकअप प्रदान करेगा। लेकिन चंद्रकक्षा में घूमते-घूमते साल में दो-तीन बार ऐसी स्थिति आ जाएगी जब सूरज की और चंद्रयान के बीच चांद आ जाएगा। ऐसी स्थिति से निपटने के लिए इसमें विशेष इंतजाम हैं। इसरो के अनुसार चंद्रयान को हर समय 700 वाट बिजली चाहिए। इसके लिए इसमें एक शक्ितशाली सोलर पैनल लगाया गया है। 2.15 मीटर लंबा तथा 1.8 मीटर चौड़ा है। पैनल सौर ऊर्जा से मिलने वाली ऊर्जा को चंद्रयान में लगी बैटरियों को ट्रांसफर करगा और बैटरी सिस्टम के जरिये ऊर्जा अन्य उपकरणों तक पहुंचेगी। बैटरी में ऊर्जा को स्टोर भी किया जा सकता है। चूंकि सूरज की रोशनी नियमित रूप से चंद्रयान को मिलेगी इसलिए चंद्रयान कार्य करता रहेगा। इसरो के वैज्ञानिकों के अनुसार चंद्रयान को दो साल तक चंद्रकक्षा में स्थापित रखना है। लेकिन इस दौरान चार-पांच अवसर ऐसे आ सकते हैं। जब चंद्रग्रहण जैसी स्थिति हो। यानी सूर्य और चंद्रयान के बीच में चंद्रमा आ जाएगा। तब सूरज की किरणें चंद्रयान पर नहीं पहुंच पाएंगी। ऐसी स्थिति में कुछ समय तक तो सौर ऊर्जा से मिला बैटरी बैकअप चल सकता है लेकिन बाद में सेटेलाइट कार्य करना बंद कर सकता है। वैज्ञानिकों के अनुसार ऐसी स्थिति से निपटने के लिए अतिरिक्त इंतजाम किए गए हैं। चंद्रयान में 36 एएच हाई पावर्ड लिथियम आईओएन बैटरी लगाई गई हैं। जैसे ही चंद्रयान को सूरज की रोशनी मिलनी बंद हो जाएगी तो वह इस बैटरी के बैकअप से संचालित होगा। यह बैकअप 4-6 घंटे तक का रहता है। अलबत्ता वैज्ञानिकों का कहना है कि इतने ज्यादा जरूरत पड़ती नहीं है।

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