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राज ठाकरे पर महाराष्ट्र सरकार की नरमीका राज

महाराष्ट्र में मराठी और गैरमराठी के मुद्दे पर हरक राजनीतिक पार्टियां अपनी तरह से रोटियां सेक रही हैं। यह दीगर है कि मराठी के मुद्दे की आग जलाए रखने का ठेका फिलहाल महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के अध्यक्ष राज ठाकर के पास है जबकि शिवसेना खुद को इस ठेके के दावेदार बीते 40 सालों से बता रही है। मगर इसी मुद्दे पर शिवसेना बिखर भी रही है। इस बिखराव का फिलहाल सीधा फायदा मनसे को दिख रहा है। मराठियों पर बाल ठाकर की बादशाहत कमजोर पड़ रही है और नए युवराज के रूप में राज चमक रहे हैं।ड्ढr ड्ढr लेकिन राजनीतिक पंडितों का अनुमान है कि इस बिखराव की वजह से चुनावी रणभूमि में कांग्रेस बाजी मारने वाली है। क्योंकि महाराष्ट्र के तमाम मराठी राज या बाल ठाकर की तरह नहीं सोचते हैं।ड्ढr गैरमराठियों से उनका वही रिश्ता है जो मराठियों के बीच है। एसे में महाराष्ट्र की लगभग 11 करोड़ की आबादी में शिवसैनिक ही मनसे में जा रहे हैं और एक जमाने में कम्युनिस्टों को तोड़ने के लिए यही फामरूला कांग्रेस ने अपनाया था। अब इसका फायदा कांग्रेस और राकांपा लेने की सोच रही है।ड्ढr आने वाले संसदीय और विधानसभा चुनावों के गणित को समझते हुए महाराष्ट्र सरकार ने राज पर लगाम लगाने में ढिलाई बरत रही है। खासकर कांग्रेस को भरोसा है कि राज के निशाने पर रहे उत्तर भारतीयों के वोट उनके पक्ष में ही आने वाले हैं। उत्तर भारतीय के सामने विकल्प के तौर पर दूसरी कोई पार्टी नहीं है। इसलिए मुंबई कांग्रेस की कमान पूर्वाचल के रहने वाले कृपाशंकर सिंह को सौंप दी गई है।ड्ढr ड्ढr शिवसेना और अब मनसे के दमन से परशान उत्तर भारतीयों को नए परिसीमन के आधार पर मुंबई और ठाणे से ज्यादा से ज्यादा सांसद और विधायक चुनने का मौका मिल रहा है और यही महाराष्ट्र की सत्ता के निर्णायक साबित होंगे। मुंबई और ठाणे में उत्तर भारतीयों का दबदबा है लेकिन वे भी शिवसेना और मनसे की उत्पात को सहते हुए चुनाव का इंतजार कर रहे हैं।ं

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