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28 मार्च, 2020|2:03|IST

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मन की स्थिरता

चंचलता मन का स्वभाव है, क्योंकि यह प्रकृति प्रदत्त है। चंचलता का उद्गम स्फूरणा है। स्फूरता में लिप्तता होने से वह संकल्प में बदल जाती है। संकल्प लिप्तता ही कामना है। यह कामनाएं ही हैं जो बंधनकारक हैं। यह न अपने स्वरूप का बोध होने देती हैं, न सेवा कार्य करने देती हैं। न भगवद प्रेरक होती हैं, न ही किसी प्रकार परहित में लगने देती हैं। अत: इन कामनाओं के त्याग के लिए जो-ाो साधन भगवान ने बताए हैं, उनकी विवेचना करें। संकल्पों-विकल्पों की रूपरखा भूत अथवा भविष्य से होती है अत: इन संकल्पों का त्याग हमें भूत-भविष्य से छुड़ाकर वर्तमान में स्थित करना है और कर्तव्यों का पालन वर्तमान से ही जुड़ा होता है, जिससे वर्तमान में हमारी उपस्थिति हमें कर्तव्यनिष्ठ बनाती है। संकल्पों की संसार में कोई सत्ता नहीं है। संकल्पों-विकल्पों में राग-द्वेष की बुद्धि न रहे यही हमार लिए अच्छा है। राग ही तो आसक्ित है। यही आसक्ित दुखों का मूल कारण है। भविष्य जो अभी आया नहीं, काल के गर्भ में है, जिसे जानते नहीं। उनकी सत्ता-अस्तित्व अभी नहीं है, उनकी चिन्ता वे संकल्प अभी तो व्यर्थ ही हैं, उनमें हम समय बर्बाद कर रहे हैं, किन्तु जो अभी वर्तमान में भगवद्सत्ता, विषय, पदार्थ, व्यक्ित, प्रभाव के रूप में विद्यमान है, हमार पास है, उनकी ओर दृष्टि भी नहीं करते। उसके बार में सोचते नहीं। वर्तमान को जीते नहीं, वर्तमान को भोगते नहीं। उसे भी यूं ही व्यर्थ गंवा रहे हैं। वर्तमान की उपस्थिति को अनुभव करं, उसे जीएं और पीएं और उसी के संकल्पों को, कर्मो को अनासक्त होकर कर जाएं तो फिर हमार जीने का ढंग बदल जाए। इस ढंग के लिए ही, मन की स्थिरता आवश्यक है। गति में बेचैनी है, थकावट है, श्रम है किन्तु स्थिरता सुख है, आनन्द है, विश्राम है और स्पष्टता है। किसी भी रोग का मूल कारण ज्ञात हो तो उसका निदान करके रोग से सदा के लिए छूटा जा सकता है। ऐसे ही मन बुद्धि की चंचलता जो मनोरोग है, उसके कारण जो सुख-दुख की प्रतीती है, उससे छूटने के लिए मन की स्थिरता प्राप्त करनी आवश्यक है। नीरोगी हो जाएंगे।ं

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  • Web Title: मन की स्थिरता