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सब कुछ नियम से ही

लोक प्रचलित धारणा यह है कि ईश्वर असम्भव को सम्भव कर सकता है। वह भी कर सकता है, जो नियम के प्रतिकूल है। इसलिए, जब भी इस संसार में अद्भुत या चमत्कार की दैवीय घटना घटती है तो लोग बिना सोचे झट से कह देते हैं- ईश्वर की महिमा है, वह क्या नहीं कर सकता? यह धारणा महा अशिक्षितों में नहीं है, बल्कि पढ़े-लिखे लोगों में भी प्रतिशत लोग ऐसी धारणा रखते हैं। यह धारणा कुछ सालों की नहीं है, हाारों सालों से लोग ऐसा मानते आए हैं। आधुनिक युग विज्ञान का युग है। विज्ञान नियमों को मानता है। नियम के विपरीत कोई भी चीज सही नहीं मानी जा सकती। विज्ञान का ज्ञान कुछ सालों का नहीं है, बल्कि बहुत पुराना है। सृष्टि के प्रारंभ से ही वेदों के जरिए परमात्मा ने मनुष्य को विज्ञान का ज्ञान दिया। वेद में स्पष्ट लिखा है- इस ब्रह्माण्ड में नियम के प्रतिकूल कुछ भी नहीं है। एक-एक पल नियम के अनुसार है। सूर्य, चन्द्र, तार, आकाशगंगाएं, हवा, अग्नि, जल और धरती का हर स्पन्दन नियम में बंधा हुआ है। मतलब ईश्वर भी इन नियमों के विरुद्ध कुछ नहीं कर सकता है। सृष्टि के नियम के अनुसार ही दिन और रात होते रहते हैं। ईश्वर इसमें फेरबदल नहीं कर सकता है। ईश्वर जल और संसार की किसी भी तत्व का स्वभाव एवं गुण धर्म नहीं बदल सकता। मतलब यह है कि प्रकृति में सृष्टि के वक्त जो नियम एवं गुण, क्षमता, शक्ित और भाव निर्धारित किए गए, उसके उलट कुछ भी नहीं हो सकता। विज्ञान में जितनी भी खोजें हो रही हैं वे नियम के आधार पर ही। जसे ही नियम के खिलाफ कुछ अलग करने की कोशिश की जाती है, विध्वंसकारी परिणाम सामने आता है। आज संसार में जितनी भी समस्याएं हैं, वे नियमों को तोड़ने के कारण पैदा हुई हैं। इसलिए नियम में रहकर यदि हम जीवन को सुखमय बनाने की कोशिश करं तो इससे अपना भला होगा ही, सृष्टि, समाज एवं मानवता का भी भला होगा।

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