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पार्क की पहचान बिल्कुल आसान

ााली भूखंड.., टूटी-फूटी दीवारें.., कूड़े के ढेर.., सुअरों का बसेरा.., यह दृश्य सौ से अधिक स्थानों पर देखने को मिलता है। अर, चौंकिए नहीं जनाब। आप राजधानी में ही हैं। अब आपके मन में यह सवाल पैदा होगा कि शहर में यह दृश्य कैसे हैं? बताइए ये क्या हैं? नहीं मालूम! चलिए हम बता देते हैं। ये हैं शहर को खूबसूरत बनाने के सपने यानी पार्क। क्योंे, है न राजधानी के पार्को की पहचान बिल्कुल आसान! बच्चे कहां धमाचौकड़ी करं? बुजुर्ग स्वास्थ्य लाभ के लिए सुबह कहां सैर करं? व्यस्त जीवन से थोड़ा समय निकाल कर आप अपने परिवार के साथ चंद लम्हें कहां गुजारं?ड्ढr पार्को की दुर्दशा पर ऐसे ही सवाल लोगों के जेहन में उठते हैं, इसका जवाब देने वाला कोई नहीं है। दूसर शहरों से किसी काम से पटना आने वाले लोगों को भी पार्को की स्थिति पर आश्चर्य होता है।ड्ढr ड्ढr वे राजधानी को महानगर बनाने की सरकारी घोषणाओं की सच्चाई से रू-ब-रू होते हैं। फिर अपनी मंजिल की ओर बढ़ जाते हैं। राजधानी में छोटे-बड़े 150 से अधिक पार्क व गोलंबर हैं। इनमें से 0 फीसदी बदहाल हैं। बिहार राज्य आवास बोर्ड के 71, पटना नगर निगम के 43, निगम के योजना एवं विकास शाखा के 14 पार्क हैं। इनमें अगर सोसाइटी के पार्को को भी शामिल कर लिया जाए तो इनकी संख्या दो सौ तक पहुंच जाएगी। राजधानी के प्राय: सभी पार्को का हाल बेहाल है। कहीं पार्क को शौचालय के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है तो कहीं कूड़ा डंप करने के लिए। किसी पार्क पर दबंगों का कब्जा है तो कहीं आस्था के नाम पर कब्जा करने के प्रयास हो रहे हैं। वीर कुंवर सिंह पार्क में नशेड़ियों व अपराधियों का जमावड़ा लगा रहता है। इस पार्क के पास आर ब्लॉक गोलंबर पर धरना-प्रदर्शन होते रहने के कारण पार्क में यत्र-तत्र मल-मूत्र फैला रहता है।ड्ढr ड्ढr नगर निगम के पार्को की देख-भाल के लिए माली नियुक्त हैं। लेकिन, वे पार्को की देखरख करने की बजाय अधिकारियों और नेताओं की सेवा में व्यस्त रहते हैं। पटना हाईकोर्ट के निर्देश पर शहर को सुंदर बनाने के लिए बिना फंड के गठित ‘पटना सौंदर्यीकरण कोषांग’ ने दम ही तोड़ दिया। ऐसा नहीं है कि कोषांग ने कुछ नहीं किया। जहां तक संभव हो सका, किया। निजी कंपनी और संगठनों के हाथ-पैर जोड॥कर 16 पार्को और गोलंबरों के सौंदर्यीकरण का काम पूरा कराया। दो माह पहले सरकार ने नौ पार्को के विकास के लिए राशि उपलब्ध कराई। इन पार्को के जीर्णोद्धार का काम शुरू भी कर दिया गया है। कंकड़बाग, राजेंद्रनगर, कदमकुआं, श्रीकृष्णानगर व श्रीकृष्णापुरी समेत अन्य मुहल्लों में भी पार्क हैं, पर सिर्फ नाम के। सभी की स्थिति कमोवेश एक जैसी ही है। आनंदपुरी, नेहरूनगर, महेशनगर, आशियानानगर समेत बेली रोड इलाके में आबादी के बीच तो पार्क के नामोनिशान तक नहीं हैं। बहरहाल पार्को के दिन कब बहुरंगे, यह कहना मुश्किल है, लेकिन इतना तो तय है कि जीने के लिए सिर्फ ऊंची अट्टालिकाएं ही नहीं, बल्कि चंद ऐसी जगहों की भी जरूरत है, जहां कुछ लम्हे प्राकृतिक सुंदरता के बीच सुकून से गुजारा जा सके।ंंं

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