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राजनीतिक रोटियां सेंकने से परहेचा करं

आज औद्योगिकीकरण का युग है, लेकिन झारखंड समेत अन्य राज्यों में औद्योगिकीकरण का जिस तरह से विरोध हो रहा है और जिस तरह से राजनीतिक गतिरोध उत्पन्न हो रहा है, वह चिंता का विषय है। समस्या के समाधान के लिए समस्या के मूल कारणों को समझना आवश्यक है। औद्योगिकीकरण के कारण विस्थापन एक़ त्रासदीपूर्ण घटना है। आदिवासियों के जीवन में भूमि एक आधारभूत तत्व है। लेकिन हमार नियोजनकर्ता और नीति निर्धारक इस बात को नहीं समझ पाये। बड़े-बड़े कल-कारखाने झारखंड में लगे और हजारों झारखंडी किसानों का विस्थापन हुआ। विस्थापन और इससे होनेवाली पीड़ा तो अवश्यंभावी थी, लेकिन इस पीड़ा को कम करने और विस्थापित ग्रामीणों के आर्थिक पुनर्नियोजन और बदली हुई परिस्थितियों में उनके सांस्कृतिक सामंजन के लिए बेहतर प्रयास किये जा सकते थे। विस्थापितों को मुआवजा और नौकरी मिली। मुआवजा समुचित था अथवा नहीं, इस पर विवाद हो सकता है, लेकिन इसपर कोई विवाद नहीं हो सकता कि सकता कि कई बार मुआवजा की राशि प्रभावित आदिवासियों और ग्रामीणों के पास पहुंची ही नहीं। कई मामलों में उनकी नौकरियों पर भी दूसर लोगों ने अधिकार कर लिया। विस्थापितों की समस्याएं राजनीतिक रोटियां सेंकने वालों के लिए गर्म तवा बन गयीं। विस्थापितों के लिए किया जाने वाला आंदोलन एवं उसके नेता महत्वपूर्ण हो गये, लेकिन विस्थापित एवं उनके हित गौण हो गये। ऐसी परिस्थितियों में विस्थापितों के दर्द का लावा फूटना ही था और वह फूटा भी। भविष्य में वह नहीं फूटे, इसके लिए उपाय किये जाने चाहिए। एक संभावित हल यह हो सकता है कि विस्थापित आदिवासियों और किसानों को मुआवजा की बड़ी राशि एकमुश्त देने के बजाय इसे फिक्स्ड डिपॉजिट में रख दिया जाये, जिसे उनकी जरूरतों के अनुसार किस्तवार खर्च किया जा सके। दूसरा विस्थापितों और उनके बच्चों को ऐसा तकनीकी प्रशिक्षण दिया जाये, जिससे वे पीढ़ी दर पीढ़ी वहां के कारखाने और उद्योगों में सहजता से नियोजन पा सकें। ऐसी सुविधा वैसे भूमिहीनों और उनके बच्चों को भी मिलनी चाहिए, जो उस क्षेत्र में रहते हैं। ऐसा होने से वे उन्हीं कल-कारखानों में समायोजित हो जायेंगे। उनके बच्चे कारखाने के स्कूलों में पढ़कर नये सांस्कृतिक परिवेश में पूरी तरह से घुलमिल जायेंगे। आज स्थिति यह है कि विस्थापित आदिवासी और किसान अपने ही घर में बेघर और बेगाने हो जाते हैं। जब तक कारखाने का निर्माण कार्य चलता रहता है तो उन अकुशल ग्रामीणों एवं आदिवासियों को काम मिलता है। बाद में ये बेचार इन कल-कारखाने में काम करने वाले इंजीनियरों एवं बाबुओं के घरों अथवा होटलों एवं ढाबों में दाई, नौकरों का काम रने के लिए अभिशप्त हो जाते हैं। या फिर रिक्शा चलाते हैं या दैनिक मजदूरी करते हैं। कुछ छोटे-मोटे अपराधों की दुनिया में शामिल हो जाते हैं। और तब जाकर इन विस्थापितों की पीड़ा का राजनीतिक बाजार सजने लगता है और राजनीतिक गतिरोध जन्म लेने लगता है। तीसरा और अंतिम उद्योगों को अपनी आमदनी का एक निश्चित हिस्सा विस्थापितों के सामाजिक कल्याण एवं उनकी संस्कृति के संरक्षण के लिए खर्च करना चाहिए।इन सुझावों पर अमल करने से शायद विस्थापितों की पीड़ा कम हो और सबसे बड़ी बात कि सार्वजनिक जीवन में शुचिता लानी होगी, ताकि कोई भी सुझाव ईमानदारी से लागू किये जा सकें। (लेखक विनोबा भावे विवि सिंडिकेट के सदस्य और आरवीएस कॉलेज, चास के सचिव हैं।)

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