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धर्म का कार्य

ुछ व्यक्ित प्रश्न करते हैं कि एक व्यक्ित जो साधना नहीं करता, धार्मिक कार्य नहीं करता, यदि उस पर कोई विपत्ति आती है तो यह कह दिया जाता है कि वह धर्म नहीं करता, इसलिए कर्म का विपाक ऐसा हुआ है। यदि एक साधक के साथ ऐसा होता है तो यह कह दिया जाता है कि इसके पूर्व कर्म ऐसे थे। अत: उसे यह भोगना ही पड़ेगा। जो कुछ कहा जाता है वह सारा प्रमाण नहीं होता, सच नहीं होता। प्रश्न चाहे धर्म करने वाले का आए या धर्म न करने वाले का, उत्तर दो नहीं हो सकते, एक ही होगा। कर्म का जो विपाक आता है वह किया हुआ ही आता है। धर्म करने वाले को भी कर्म का विपाक भुगतना होता है और धर्म न करने वाले को भी भुगतना होता है। यह जो कहा जाता है कि धर्म नहीं करता इसलिए इसमें कष्ट आ गया है और जो धर्म करता है उसका कष्ट-पूर्व कर्मजनित है और किए हुए को भुगतना ही पड़ेगा- ये दो बातें जुड़ी हुई होती हैं। राग द्वेष से कोई मुक्त नहीं होता। धर्म करने वाला अभी वीतराग नहीं बन पाया है। उसमें राग भी है और द्वेष भी है। प्रियता और अप्रियता की धारा बराबर चलती है। धर्म करने वाले में कष्ट नहीं आता, यह कोई बड़ी बात नहीं है। जो व्यक्ित सामाजिक जीवन जीता है, वह कष्ट से बच नहीं सकता। धर्मगुरु को भी शरीर का कष्ट भोगना ही होगा और कभी-कभी मानसिक कष्टों का भी अनुभव करना पड़ेगा। धर्म करने वाले को भी कष्ट आएगा, यह मान्य सत्य है। इसको झुठलाया नहीं जा सकता। किन्तु धर्म करने वाले व्यक्ित की विशेषता यह होती है कि वह कष्ट आने पर गिडगिड़ाता नहीं, रोता नहीं, घुटने नहीं टेकता, संतुलन नहीं खोता और आने वाले कष्टों को सहर्ष झेल लेता है। वह उन्हें प्रसन्नता से सहता है और अपनी शांति को नहीं खोता। जिस व्यक्ित में धर्म की चेतना नहीं जागती, अध्यात्म का अनुभव नहीं हो जाता, वह कष्टों को झेल नहीं पाता, घुटने टेक देता है, दीन-हीन हो जाता है। उसकी नींदा हराम हो जाती है और पूरा दिन तनाव में बीतता है। धार्मिक व्यक्ित कष्टों को निमंत्रण देता है, सहता है और अपनी प्रसन्नता बनाए रखता है। धर्म नहीं करने वाला कष्टों से घबरा जाता है, वह अनायास ही अन्यान्य बीमारियों से ग्रस्त हो जाता है। यदि भेद का विकल्प होता कि धर्म करने वाले को कष्ट नहीं आएगा और न करने वाले को कष्ट आएगा तो आज अधार्मिक कोई रहता ही नहीं। धार्मिक व्यक्ित भी शारीरिक, मानसिक व आर्थिक संकटों से गुजरता है। अन्यान्य कष्ट भी आते हैं।

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