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‘चीन से सीमा विवाद पर प्रगति बहुत मामूली’

चीन से सीमा विवाद सुलझाने के लिए नियुक्त विशेष प्रतिनिधयों के बीच वार्ता के बारह दौर हो चुके, लेकिन अभी तक कोई बड़ी कामयाबी हासिल नहीं हुई है। फैसला हुआ था कि हम मानचित्रों पर अपने अपने दावे व्यक्त करेंगे और उनका आदान-प्रदान करेंगे। पश्चिमी और पूर्वी सेक्टर में तो अभी मानचित्रों का आदान प्रदान नहीं हो पाया है। केवल मध्य सेक्टर के मानचित्रों का आदान-प्रदान हुआ है। कह सकते हैं कि केवल इस सेक्टर में कुछ प्रगति हुई है। विदेशमंत्री प्रणव मुखर्जी ने राज्यसभा में उक्त जानकारी शोभना भरतिया के सवाल के जबाव में दी। उन्होंने पूछा था कि सीमा के निर्धारण के मसले पर क्या प्रगति हुई है। प्रणव मुखर्जी ने बताया कि भारत का मानना है कि उसका 38 हाार वर्ग किमी इलाका चीन के अवैध कब्जे में है। इसके अतिरिक्त पाक ने अपने अधिकृत जम्मू -कश्मीर क्षेत्र से 5 हाार किलोमीटर से कुछ अधिक इलाका इलाका चीन को दे दिया है। इसी तरह चीन पूर अरुणाचल प्रदेश को अपना इलाका मानता है। भारत चीन के इस दावे को स्वीकार नहीं करता। उन्होंने जानकारी दी कि घुसपैठ की वारदातें इसलिए होती हैं क्योंकि दावेदारी को लेकर अलग-अलग धारणाएं हैं। श्रीमती भरतिया ने पूरक सवाल में यह भी कहा कि सीमा के उस ओर बहुत तेजी से इन्फ्रास्ट्रक्चर का विकास हुआ है जिसकी बदौलत चीन चंद हफ्तों में तिब्बत की सीमा पर सेना जुटा सकता है, लेकिन भारत की ओर एसा नहीं है। आखिर इस दिशा में क्या किया जा रहा है? मुखर्जी ने कबूल किया कि सीमा के उस पार बेहतर इन्फ्रास्ट्रक्चर है। लेकिन अब हम तेरह आपरशनल सड़कें प्राथमिकता के आधार पर बनाने जा रहे हैं। ये 2012 तक तैयार हो जाएंगी।

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