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दादा का दर्द

लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्ाी की व्यथा किसी एक दिन की घटना का परिणाम नहीं, बल्कि पिछले चार बरस से आहत हृदय की अभिव्यक्ित है। इस दौरान कई मौके आए, जब विपक्षी दल भाजपा के साथ अपनी पुरानी पार्टी (माकपा) ने उन पर भेदभाव बरतने के आरोप लगाए और उनके फैसलों पर उंगली उठाई। जबकि सदन की कार्यवाही सुचारू तरीके से चलाने के लिए उन्होंने जो कदम उठाए, वे उसकी प्रक्रियाओं और मान-मर्यादा की रक्षा के मद्देनजर थे। उन्होंने यही चाहा कि माननीय सदस्य सभ्य, सुसंस्कृत और सम्मान-भाव के साथ आचरण करें, न कि बेमतलब शोरगुल, टोका-टोकी और वाक्आउट कर व्यवधान डालें। पहले भाजपा उन पर सत्ताधारी और वामदलों के सदस्यों के साथ पक्षपात के आरोप लगाती रही। संप्रग सरकार से वामदलों के समर्थन वापस लेने के कुछ दिनों बाद वह अपने साथी कॉमरडों के निशाने पर आ गए। उनकी पार्टी चाहती थी कि अध्यक्ष पद से वह इस्तीफा दे दें और विश्वासमत के दौरान सरकार के खिलाफ मतदान करं। पार्टी के बजाय उन्होंने संवैधानिक संस्था को सवरेपरि माना और इस्तीफा नहीं दिया। यहीं से वामदलों ने उनसे रार पालना शुरू कर दिया। ताजा मामले में अमर्यादित आचरण के चलते उन्हें केरल के एक माकपा सदस्य ए. पी. अब्दुल्ला कुट्टी को सदन से एक दिन के लिए निलंबित करना पड़ा, जिस पर पार्टी सदस्यों ने उन पर फिर निशाना साधा और उनके फैसले को भेदभावपूर्ण बताया। इस तरह की कटु स्थितियों पर अध्यक्ष का क्षोभ स्वाभाविक है और सदन की गरिमा बनाए रखने के लिए उन्हें हर जायज कदम उठाने का अधिकार भी। सोमनाथ न सिर्फ विद्वान, मूर्धन्य सांसद व प्रख्यात वकील हैं, बल्कि संवैधानिक और लोकतांत्रिक प्रक्रिया-परम्पराओं से पूरी तरह वाकिफ भी हैं। इन्हीं गुणों के चलते सभी दलों ने उन्हें एकमत से अध्यक्ष चुना था। इसके बावजूद उन्हें विवादों में घसीटा जाता है तो यह दुर्भाग्यपूर्ण है। सांसदों को अपने आचरण पर आत्ममंथन करना चाहिए क्योंेकि सदन को सुचारू रूप से चलाने में सभी सदस्यों का सहयोग जरूरी है।

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