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मराठी परंपरा के पुरुषार्थ हैं दिलीप चित्रे

महाराष्ट्र में जो कतिपय भाषाई कट्टरपंथी गैरमराठी भाषियों पर कहर बरपा रहे हैं, उन्हें अपनी परंपरा की कोई समझ नहीं है। महाराष्ट्र में अंतर्भाषा संवाद की लंबी और गगनचुंबी परंपरा रही है। बहुत अतीत में जाने की जरूरत नहीं है। आधुनिक काल में ही देखें तो सखाराम गणेश देउस्कर इस संवाद की अत्यंत मजबूत कड़ी थे। मराठी भाषी होते हुए भी देउस्कर ने बांग्ला में किताब लिखी थी- ‘देशेर कथा’। 105 के बंग भंग पर यह सर्वाधिक महत्वपूर्ण पुस्तक है। बांग्ला के सभी प्रमुख साहित्यकारों ने इस पुस्तक की भूरि-भूरि प्रशंसा की थी। उन्हीं देउस्कर के भांजे थे- बाबू राव विष्णु पराड़कर। उन पर मामा का प्रच्छन्न प्रभाव था। अनुशीलन समिति से जुड़े थे। क्रांतिकारियों के निकट संपर्क में थे। बाद में पत्रकारिता में गए तो वहां भी अपने जागरूक विवेक से मिशन व प्रोफेशन में संतुलन बनाए रखा। यदि प्रोफेशन की समझ न होती तो ‘आज’ को पराड़कर कैसे स्थापित कर पाते। हिंदी-बांग्ला में आज हम ‘श्री’, ‘श्रीमती’ और राष्ट्रपति जसे शब्दों का जो इस्तेमाल करते हैं, वे मराठीभाषी पराड़कर के चलाए हुए हैं। उसके पहले मिस्टर, मिसेज और प्रेसीडेंट का इस्तेमाल होता था। मराठीभाषी होते हुए भी पराड़कर जी ने हिंदी पत्रकारिता और हिंदी गद्य की पर्याप्त सेवा की। वे पत्रकारिता के आग्नेय पथ के अप्रतिम यात्री थे। ऐसे अनेक उदाहरण दिए जा सकते हैं जिन्होंने मराठीभाषी होते हुए भी हिंदी की सेवा की। प्रभाकरा माचवे से लेकर चंद्राकंत वांडिवडेकर तक। देउस्कर-पराड़कर की उसी अंतर्भाषा संवाद की अगली कड़ी दिलीप पुरुषोत्तम चित्रे हैं। उन्होंने अनुवाद का विपुल काम किया है और अंतर्भाषा संवाद को समृद्ध किया है। वे देउस्कर की विचार यात्रा की ऐसी अगली कड़ी हैं, जिन्हें मराठी परंपरा का पुरुषार्थ कहना ज्यादा उपयुक्त होगा। दिलीप चित्रे से मेरी कई बार बातचीत हुई है। वे हमेशा दूसरी भारतीय भाषाओं के श्रेष्ठ साहित्य की तारीफ करते नहीं अघाते। उनके अंतरंग मित्रों में दूसरी भाषाओं के लेखक ही ज्यादा हैं।ड्ढr दिलीप चित्रे मराठी के सुविख्यात कवि, कथाशिल्पी और अनुवादक हैं। उनकी रचनाओं में हम अपनी धड़कन सुन सकते हैं। उनमें हम अपना ही रक्त दौड़ता महसूस करते हैं- अत्यंत ताप और प्रवाह के साथ दौड़ता रक्त। ‘एंबुलेंस राइड’, ‘कवितेवंतरच्या कविता’ और ‘ट्रेवलिंग इन ए केा’ काव्य संग्रहों में जीवन के कई-कई रंग हैं। कई-कई रस हैं। मुलायम भी, कठोर भी, कड़वा भी, मीठा भी। सर्जनात्मक अन्वेषण और वैचारिक ताप और सूक्ष्म गहरी ऐंडिक अनुभूति उनकी कविता की प्रमुख विशेषताएं हैं। दिलीप के काव्य संग्रह जीवन के सत्तर बसंतों की हरीतिया से दीप्त अनेक स्वरों का विरल और विलक्षण पुंज है। रोमर्र के जीवन की आपाधापी में जो चीजें हमसे छूट जाती हैं, अलक्षित रह जाती हैं, उन्हें भी वे अविस्मरणीय काव्य अनुभव बना देते हैं। उनकी कविता के दायर में समूचा जगत है और अखिल जगत के सवालों पर वे कभी जबर्दस्त नैतिक आवेग के साथ, कभी तीक्ष्ण बौद्धिक प्रखरता तो कभी भावात्मक उत्कटता के साथ विचार करते हैं और कविता का नया शिखर बन जाते हैं। दिलीप चित्रे ने संत तुकाराम की कविताओं का अंग्रेजी में अनुवाद कर अंतर्भाषा संवाद को पुष्ट करते हुए अंग्रेजी पाठकों को श्रेष्ठ काव्य के आस्वाद का अवसर दिया है। दिलीप चित्रे की कविताओं में ही नहीं, उनकी कथा कृतियों में भी वैचारिक और नैतिक आख्यान का अटूट सिलसिला है। उनके उपन्यास ‘चतुरंग’, कहानी संग्रह ‘आफियस’, यात्रा संस्मरण ‘शीबारानीच्या’, निबंध संग्रह ‘चाव्या’ को पाठकों की अपार सराहना मिली है। उनके द्वारा किया अनुवाद ‘ऐन एंथ्रोलाली आफ मराठी पोएट्री’ भी बेहद महत्व का काम है। साहित्य अकादमी समेत दर्जनभर पुरस्कारों से सम्मानित दिलीप ने पिछले 17 सितम्बर को अपने जीवन के 70 वर्ष पूर किए। वे 71वें में चल रहे हैं। यह देखकर अच्छा लगता है वे निरंतर लेखन व अंतर्भाषा संवाद में सक्रिय हैं। जिस तरह दिलीप चित्रे की भाषा और शिल्प को उनके कथ्य से विलग नहीं किया जा सकता, उसी तरह कुछ उपद्रव करके दिलीप के अंतर्भाषा संवाद को क्षीण नहीं किया जा सकता। दिलीप जसे लोग एक तरफ अपनी रचनाओं के जरिए आज के मनुष्य के दुख-सुख, जय-पराजय, संघर्ष-भीषणता और आधुनिकता की कलात्मक प्रस्तुति करते हैं, वहीं भाषा-बंधन भी निर्मित करते हैं और देउस्कर-पराड़कर जसे पुरखों के भाषा-सेतु परंपरा को आगे बढ़ाते हैं। महाराष्ट्र के भाषाई कट्टरपंथी अपने पुरखों की उस परंपरा का अपमान कर क्या दर्शाना चाहते हैं। वे अपनी परंपरा के प्रति श्रद्धा निवेदित कर रहे हैं या श्राद्ध कर रहे हैं?

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