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सुनिय महामहिम :रलमंत्री के नाम एक खुली चिट्ठी

पिछले दिनों प्रेमचंद स्मृति सम्मान एक युवा कथाकार को प्रदान करने के लिए मुझे दिल्ली से बांदा जाना पड़ा। आयोजकों ने मेरा तथा मेरे अन्य साथी साहित्यकारों का आरक्षण महाकौशल एक्सप्रेस से करवाया था। हम सब अच्छे मूड में निजामुद्दीन स्टेशन से रवाना हुए। हम रचनाकारों के जीवन में संगोष्ठियां और सम्मेलन मेले और मेल-मिलाप का प्रयोजन होते हैं। महाकौशल एक्सप्रेस में सही समय पर टिकटों की जांच और बिस्तर बांटने की कार्रवाही हुई। हालांकि बाथरूम में शीशा टूटा और साबुन नदारद था पर इन्हें मामूली बातें मान कर नजरअन्दाज किया जा सकता था। असली परशानी पैदा हुई रात को जब बिस्तर बिछाते ही ए-1 वातानुकूलित टू-टायर कोच में सभी सीटों पर कॉक्रोचों ने धावा बोल दिया। वे एक दो की संख्या में होते तो हम लोग उन्हें कुचलने में कामयाब होते पर वे तो सैकड़ों की संख्या में कोच की दीवारों पर, फर्श पर, बिस्तर पर, हमार सामान पर, खिड़की के पर्दो पर, सीट की दरारों में गश्त लगा रहे थे। प्राणिमात्र के लिए दया होने के बावजूद मेर मन में कॉक्रोचों के लिए कोई महत्व नहीं है। मुझे कॉक्रोचों से इतनी घिन है कि उस रात मेर सार बदन में अलर्जी निकल आई, छींकों के मार बुरा हाल हो गया और तबीयत खराब हो गई। मैंने कोच अटेन्डेन्ट से कहा, ‘भाई तुम्हार पास कॉक्रोच भगाने वाला कोई स्प्रे या पाउडर हो तो यहां डाल दो।’ उसने कोच में लिखी एक तारीख दिखाई ‘मैडम 25 तारीख को दवा का छिड़काव हो चुका है। तीन महीने बाद दवा फिर डाली जाएगी।’ कॉक्रोच तारीख पढ़ कर नहीं आते। वे तो दो दिन बाद ही मटरगश्ती को निकल आए। आप हार्वर्ड और वार्टन जसी युनिवर्सिटीा में एम.बी.ए. की कक्षाओं को व्यवसाय प्रबंधन पर व्याख्यान दे चुके हैं। आपके कार्यकाल में रलों ने बहुत प्रगति की है। इनके व्यवसाय प्रबंधन के लिए आप भारतीय रलों की स्वच्छता भी संभालें वरना हमार हिसाब से आपको महाकौशल एक्सप्रेस का नाम महाकॉक्रोच एक्सप्रेस रखना पड़ेगा। बांदा से मुझे बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय जाना था जहां मेर दो व्याख्यान आयोजित थे। बुन्देलखण्ड एक्सप्रेस को रात दो बजे आना था। स्टेशन पहुंचने के बाद उद्घोषणा हुई कि गाड़ी ढाई घंटे विलम्ब से, सुबह साढ़े चार पर आएगी। आयोजक हमें विदा देकर प्रस्थान कर चुके थे। प्लेटफॉर्म पर रात काटने के सिवा और कोई विकल्प सामने नहीं था। बुन्देलखण्ड एक्सप्रेस साढ़े तीन घंटे बाद, सुबह 5-30 पर आई। उसमें अपार भीड़ थी। जितने लोग गाड़ी के अंदर बैठे थे, उनसे बहुत ज्यादा गाड़ी की छत पर बैठे हुए थे। मैं सोच रही थी उनकी टिकट जांचने के लिए टीटीई क्या ऊपर चढ़ते होंगे! कई यात्री बैठे-बैठे ऊंघ रहे थे। इस बात का पूरा खतरा था कि वे नीचे गिर जाएं। गाड़ी सुबह की जगह शाम को बनारस पहुंची। मेरा सारा कार्यक्रम गड़बड़ा गया। तीसरा तजुर्बा सरयू-यमुना एक्सप्रेस में आजमगढ़ से दिल्ली लौटने का है। इस गाड़ी को 12 अक्तूबर रविवार शाम सात बजे आजमगढ़ से चलना था। 131 पर स्टेशन फोन करने पर यही सूचना मिली कि गाड़ी के कुछ देर से आने की सम्भावना है। रात बाहर बजे हम आजमगढ़ रलवे स्टेशन पर आ गए। मेर साथ हिन्दी के सभी वरिष्ठ रचनाकार सफर कर रहे थे। इनमें प्रमुख रूप से सर्वश्री नामवर सिंह, असगर वजाहत, रवीन्द्र कालिया, चित्रा मुद्गल, गंगाप्रसाद विमल, भारत भारद्वाज, उपेन्द्र कुमार और साधना अग्रवाल थे। सरयू-यमुना एक्सप्रेस को छपरा से आना था। पता चला उसके छपरा से चलने की कोई सूचना नहीं है। गाड़ी अपने निर्धारित समय से दस घंटे लेट थी। प्लेटफॉर्म पर इतनी भीड़ बढ़ गई थी कि सभी बेंचों पर प्रतीक्षारत यात्री ठसाठस बैठे थे। प्रतीक्षालय में इतना बुरा हाल था कि लोग मेजों पर चढ़ कर सो रहे थे। प्रतीक्षालय में बिजली-पंखा नहीं था। हम सब रचनाकार होटल से चैकआउट कर चुके थे। टैक्िसयां हमें छोड़कर वापस जा चुकी थीं। हमार पास प्लेटफॉर्म पर वक्त बिताने के सिवा कोई चारा नहीं था। शौचालय की दीवार के बाहर बनी ‘पटिया’ पर हम बारी-बारी से बैठते रहे क्योंकि हम नौ यात्रियों के बैठने के लिए वहां पर्याप्त जगह नहीं थी। वहां मलमूत्र की दुर्गन्ध से सबका हाल खराब हो रहा था। हम सब वरिष्ठ नागरिक हैं। इतने घंटे खड़े रहना हमार लिए सम्भव नहीं था। प्लेटफॉर्म पर और कहीं खड़े होने के लिए स्थान नहीं था। हमार लिए ये दस घंटे बिताना कितना कष्टदायक रहा होगा, आप समझ सकते हें। हमें रविवार चल कर सोमवार सवेर दिल्ली पहुंचना था, जहां कोई न कोई अनिवार्यता हममें से प्रत्येक की प्रतीक्षा कर रही थी। किसी का आकाशवाणी में कार्यक्रम था तो किसी का दूरदर्शन में। किसी को कहीं व्याख्यान देना था तो किसी को अपने आत्मीय के यहां पार्टी में जाना था। सोमवार का समूचा दिन सरयू यमुना एक्सप्रेस ने खा लिया। गाड़ी ओर पिछड़ती गई और हम रात ग्यारह बजे पुरानी दिल्ली स्टेशन पहुंचे। कई साथियों की तबियत खराब हो गई। आप राजनीति की दुनिया के अनोखे खिलाड़ी हैं। आपने अपने वक्तव्यों से हमारा काफी मनोरांन किया है। चमत्कारी रल बजट बनाने में आपका जवाब नहीं। क्या आप रलों की कार्यकुशलता, चाल क्षमता और समय-व्यवस्था ठीक नहीं कर सकते? उम्मीद के साथ,ं

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