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नये एमओयू की कतार में, पुराने जमीन की आस में

देश के कुल खनिज भंडार में 30 प्रतिशत हिस्सा झारखंड का है। जाहिर तौर पर यहां औद्योगिकीकरण की असीम संभावनाएं हैं। राज्य सरकारों ने पूंजीनिवेशकों और औद्योगिक घरानों को आकर्षित करने के लिए देश-विदेश में रोड शो किये। कई बड़ी कंपनियों ने झारखंड की ओर रुख भी किया। यूं लगा था कि झारखंड में मेगा प्रोजेक्ट्स की लाइन लग जायेगी। लेकिन आज की तारीख में जो हालात इस सोच के उलट है।ड्ढr छह साल में 68 एमओयूड्ढr राज्य में आनेवाले उद्यमियों की नजर अच्छी क्वालिटी के कोयले और आयरन ओर पर थी। इससे आकर्षित होकर वर्ष 2002 से आज तक 68 एमओयू हुए। आज भी कई मेगा और लघु पूंजीनिवेशकों ने उद्योग लगाने के लिए सरकार के पास प्रस्ताव पेश कर रखा है। उद्योग विभाग ने इनके प्रस्तावों का आकलन कर योग्य आवेदन को एमओयू के लिए छांट लिया है। एमओयू का सिलसिला जारी रहा, लेकिन एक भी मेगा प्रोजेक्ट धरातल पर नहीं उतर सका।ड्ढr माइंस आवंटन में हैं कई पेंचड्ढr 2005 से लेकर 2007 तक लगभग सभी निवेशकों को कोयला और आयरन ओर माइंस की पूर्वानुमति केंद्र सरकार से भी मिली। अब फारस्ट क्िलयरेंस और अन्य औपचारिकताएं पूरी होने के बाद इन्हें कोल ब्लॉक और आयरन ओर माइंस का आवंटन किया जायेगा। निवेशकों ने जिस समय एमओयू किया, उस समय से आज तक उनके प्रोजेक्ट की लागत में भी बेतहाशा वृद्धि हो चुकी है। कंपनियां अब तक करोड़ों रुपये कार्यालय और मिसलेनियस मदों में खर्च कर चुकी हैं।ड्ढr राजनीति भी खूब हुईड्ढr जब यूपीए विपक्ष में था, तब आरोप लगाता था कि एनडीए सरकार धड़ाधड़ एमओयू किये जा रही है। कोई उद्योग धरातल पर नहीं उतर रहा है। यहां तक आरोप लगा कि एमओयू के बहाने एनडीए सरकार में शामिल लोग अपने निजी स्वार्थो की पूर्ति भी कर रहे हैं। अब यूपीए सत्ता में है। तब भी कोई उद्योग हाल-फिलहाल में धरातल पर उतरने की स्थिति में नहीं है। राज्य की विस्थापन एवं पुनर्वास नीति के ठोस आकार नहीं लेने की वजह से भी अड़चनें आती रहीं। निवेशक इस उम्मीद में थे कि पुनर्वास नीति लागू हो जाने के बाद उनकी समस्याओं का समाधान हो जायेगा। प्रोजेक्ट लगाने के लिए जमीन आसानी से मिल जायेगी। केंद्र की ओर से निर्धारित शर्तो को यहां भी लागू किया गया कि राज्य सरकार पूंजीनिवेशकों को 30 प्रतिशत जमीन उपलब्ध करायेगी, शेष 70 प्रतिशत जमीन का इंतजाम निवेशकों को खुद करना पड़ेगा।ड्ढr आरआर पॉलिसी के प्रति जागरूक नहीं ग्रामीणड्ढr आरआर पॉलिसी बनने के बावजूद जमीन के अधिग्रहण में अड़चनें आ रही हैं। निवेशकों और सरकार के लिए जमीन अधिग्रहण का मामला गले की हड्डी बना हुआ है। ऐसा इसलिए कि पुनर्वास नीति के लागू हुए दो महीने हो गये, लेकिन इसके प्रति गांवों के लोगों को आब तक जागरूक नहीं किया गया। ग्रामीण रैयतों का विरोध जारी है। विरोध भी गलत नहीं है, क्योंकि रैयतों का पुराना अनुभव अच्छा नहीं है। जिनकी जमीन अधिग्रहीत हुई है, उन्हें न तो बदले में जमीन मिली न ही समुचित मुआवजा। आयोग 11 नगर निकायों के चुनाव को तैयार प्रशासन से वैधानिक प्रक्रियाएं पूरी करने का आग्रहड्ढr ं

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