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दो टूक

मिट्टी का छोटा-सा दीया। दीये में तेल। तेल में भीगी हुई पतली-सी बाती और बाती के एक सिर पर टिमटिमाती लौ! इस लौ को, इसकी मद्धिम रोशनी को देखिए, देखते रहिए। हवा की हल्की तरंगों में कँपकपाती, कभी तेज होती और कभी अब बुझी-तब बुझी जसी। चकाचौंध रोशनी का कोई दावा नहीं। अमरता का भी कोई वादा नहीं। जब तक दीये में तेल है, बाती जलेगी। तेज झोंके आए तो बुझ भी सकती है। जलना-बुझना-ालना। प्राण की तरह। जिन्दगी की तरह। अपनी सामथ्र्य भर रोशनी बिखेरना। यही छोटी-सी लेकिन अद्भुत रूप से प्रेरक कहानी है दीये की। बिजली की चकाचौंध और विविध नाटकीयता वाली झालरं दीयों का भला क्या मुकाबला करंगी! ये बेजान लट्टू खुद चाहे जितना चमचमा-झकझका लें, लौ से लौ जलाना ये क्या जानें! बहरहाल, एक प्रसन्नचित्त, निर्भीक और निश्चिंत दीपावली के लिए हिन्दुस्तान के पाठकों को हार्दिक शुभकामनाएं..।

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