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ब्लॉग वार्ता :लापता बच्चों को खोजने की पहल

सिर्फ तीन साल में 8बच्चे गायब हो चुके हैं। 2086 बच्चों का पता तक नहीं चल सका। सूचना के अधिकार से यह जानकारी मिली, लेकिन पूरी नहीं है। दिल्ली के दस में से सिर्फ सात जिलों का यह आंकड़ा है। गायब होने वालों में सर्वाधिक संख्या 12 से 1साल की लड़कियों की है। इनमें से अस्सी फीसदी बच्चे झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले परिवारों के हैं। किरण बेदी कहती हैं कि पुलिस की रिपोर्ट और चाइल्ड हेल्पलाइन में दर्ज गुमशुदगी की रिपोर्ट में अंतर है। इंस्टीटय़ूट ऑफ सोशन साइंस ने सूचना के अधिकार से ये तथ्य तो जमा कर लिए लेकिन जो तस्वीर बनती है वो डरावनी है। भला हो सूचना के अधिकार कानून का जो आधे-अधूरे ही सही कुछ तो बता ही देता है। सूचना अधिकार कार्यकर्ता मनीष सिसोदिया कहते हैं कि इस कानून का जितना इस्तेमाल लोग करेंगे उतना ही इसका फायदा होगा। इसीलिए सूचना का अधिकार ब्लॉग हिंदी में बना है। ज्यादा से जयादा लोग इसे पढ़कर विश्वास कर सकें कि इस कानून का इस्तेमाल कोई भी कर सकता है। बस आप ड्ड द्धrद्गथ्=द्धह्लह्लश्चज्rह्लन्द्धन्ठ्ठस्र्न्.ड्ढद्यoद्दह्यश्चoह्ल.ष्oद्वद्धह्लह्लश्चज्rह्लन्द्धन्ठ्ठस्र्न्.ड्ढद्यoद्दह्यश्चoह्ल.ष्oद्व पर क्िलक कीािए। एक लाइन आपका स्वागत करगी। आम आदमी का हथियार। सूचना का अधिकार। दिल्ली के जीटीबी अस्पताल ने मुदस्सिर अली से मां के ऑपरशन के लिए तीस हाार रुपए मांग लिए। गरीबों का मुफ्त इलाज करने के नाम पर बने सरकारी अस्पतालों में आए दिन होता रहता है। फर्क सिर्फ इतना है कि इसके लिए किसी का हिंदू मन उतावला नहीं होता, किसी का मुस्लिम बन बेचैन नहीं होता। हिंदू-मुस्लिम जसे भावुक मसलों के अलावा आपने कब ऐसे जरूरी मसलों पर जनता और नेताओं को उतावला होता देखा है। मुदस्सिर अली को मालूम था वो अकेला है। या तो तीस हाार दे दे, जो कि वो नहीं दे सकता था या फिर अपनी लड़ाई खुद लड़ ले। सूचना के अधिकार का इस्तेमाल किया। अस्पताल ने अधूरी सूचना दी। मुदस्सिर अदालत चला गया। अदालत ने कहा मुफ्त में ऑपरशन होगा। यानी देश भर के सरकारी असपतालों में धक्का खा रहे या खा चुके लोगों के पास एक अधिकार है। जिसका इस्तेमाल कर वे ऐसे सनातन अस्पतालों का इलाज कर सकते हैं जो लूट का अड्डा बन गए हैं। इस ब्लॉग की सच्ची कहानियां आम लोगों के बीच सूचना के अधिकार कानून को पहुंचा रही हैं। इस ब्लॉग पर सूचना के अधिकार के लिए लड़ने वाले कार्यकर्ता सूचना आयुक्तों की पोल खोल रहे हैं। आप हैरान हो जाएंगे कि सूचना आयुक्तों के किस्से पढ़ कर। बताया गया है कि किस तरह सूचना आयुक्त ओ. पी. केारीवाल ने दिल्ली के गोपालदास को यह कह दिया कि अपने अधिकारियों से बात कर लो। यह काम सूचना आयुक्त का नहीं है। हरियाणा की सूचना आयुक्त मीनाक्षी आनंद चौधरी ने हिसार से आए राजेन्द्र यादव को यह कहकर झिड़क दिया कि मुझे जो करना था, वो कर दिया है। इसी तरह उत्तर प्रदेश के सूचना आयुक्त ब्रजेश कुमार सिंह ने सामाजिक कार्यकर्ता उर्वशी को धमकी दी और कहा कि अगर वो दुबारा आईं तो गिरफ्तार करवा देंगे। इस तरह के अनुभवों को कलमबंद करता यह ब्लॉग काफी उपयोगी है। रमन मैगसेसे पुरस्कार विजेता अरविंद केारीवाल भी यहां लिखते हैं। लोगों को सलाह देते हैं। इस ब्लॉग का एक ही मकसद है। यकीन दिलाना कि तमाम रुकावटों के बाद भी इस कानून का असर होता है। राजकोट के रत्ना आल से मिल कर आएं तो कोई संदेह भी नहीं रहेगा। रत्ना नेत्रहीन हैं। दो साल से अपने ग्राम पंचायत में हो रही गड़बड़ियों की पोल खोल रहे हैं। पेड़ लगाने और सड़क बनाने पर खर्च करने का दावा सूचना के अधिकार से खोखला साबित हो जाता है। रत्ना कहते हैं मैं अंधा हूं लेकिन मेरी नजर साफ है। यह ब्लॉग जरूरी काम कर रहा है। जिस कानून को बना कर सरकार ने छोड़ दिया है उसकी कमियों को उाागर कर रहा है। उसे लागू करने वाले लोगों की सच्चाई सामने ला रहा है। यमुना के पानी में धांधली से लेकर यूपीएससी की कहानी। एक ही अधिकार के डंडे से लिखी जा रही है। इस बीच सेंसेक्स डूब रहा है। सेंसेक्स का उूबा पैसा किसके पास गया है काश सूचना के अधिकार से पता चल जाता। लेकिन डूबते सेंसेक्स के दौर में हिंदी के ब्लॉगरों की संख्या 5000 हो गई है। ब्लॉगरों की ऐसी जमात पैदा हो रही है जो इंटरनेट कार्यकर्ता बन रहे हैं। एक जमाना था जब रैलियों से कटकर लोग सेमिनारों में पहुंच गए। अब सेमिनार से कट कर ब्लॉग पर आ रहे हैं। विरोध और विकल्प के किसी भी मंच का स्वागत किया जाना चाहिए। हिंदी के ब्लॉगरों को बधाई। लेखक का ब्लॉग है ठ्ठड्डन्ह्यड्डस्र्ड्डद्म.ड्ढद्यoद्दह्यश्चoह्ल.ष्oद्व

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