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विश्वविजेता आनंद

भारतीय खिलाड़ियों के बारे में अक्सर यह बात कही जाती है कि वे अपनी प्रतिभा के अनुरूप परिणाम नहीं दे पाते। हमारे यहां अत्यंत संभावनाशील नौजवान तो कई होते हैं, लेकिन निर्विवाद चैंपियन नहीं निकलते। विश्वनाथन आनंद इसके सुखद अपवाद हैं। रूस के ब्लादिमीर क्रैमनिक को हराकर उन्होंने साबित कर दिया कि वे शतरां के निर्विवाद बादशाह हैं। विश्व शतरां की गुटबाजी और राजनीति के चलते आनंद की बादशाहत को कबूल करने में लोग कतरा रहे थे। यह कहा जा रहा था कि अभी तक वे मैच प्ले में चैंपियन सिद्ध नहीं हुए हैं, जिसमें दो खिलाड़ी आपस में एक निश्चित संख्या में बाजी खेलते हैं, हालांकि वे पहले 128 खिलाड़ियों की नॉक आउट स्पर्धा और बारह खिलाड़ियों की राउंड स्पर्धा के विजेता रह चुके हैं। अब उन्होंने बाहर बाजियों के खेल में क्रैमनिक को हरा कर शतरां की तीनों तरह की स्पर्धाओं में अपने को सर्वश्रेष्ठ सिद्ध कर दिया। क्रैमनिक को हराना इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इस तरह की स्पर्धा में क्रैमनिक का रिकार्ड बहुत शानदार है, वे आनंद से उम्र में भी काफी कम हैं और उन्होंने गैरी कास्पारोव जसे महान खिलाड़ी से विश्व विजेता का ताज छीना था। महत्वपूर्ण यह भी है कि आनंद ने क्रैमनिक को कैसे हराया। जब तक क्रैमनिक संभल पाते, आनंद ने तीन शून्य की बढ़त ले ली थी और भले ही क्रैमनिक ने दसवीं बाजी जीत ली, लेकिन विश्व चैंपियनशिप के लिए इतना एकतरफा मैच ताजा स्मृति में तो कभी नहीं हुआ। इस मैच के पहले सभी क्रैमनिक का पलड़ा भारी मान रहे थे और इसके ठीक पहले की टूर्नामेंट में आनंद का प्रदर्शन भी अच्छा नहीं था, जिसके चलते यह संदेह हो चला था कि आनंद का फॉर्म भी अच्छा नहीं है। लेकिन अब पता चलता है कि संभवत: वे विश्व चैंपियनशिप के पहले थोड़े हल्के अंदाज में खेल रहे थे और इस मैच के लिए उनकी तैयारी जबर्दस्त थी। इस तरह आनंद ने न केवल अपनी श्रेष्ठता सिद्ध की, बल्कि यह भी सिद्ध किया कि वे एक बार चमक कर बुझने वाले पटाखे नहीं हैं। उनमें अभी बहुत दमखम है और वे आगे भी विश्व शतरां के आकाश में चमकते रहेंगे।

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