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19 नबम्बर, 2019|4:06|IST

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आंध्र प्रदेश : एक विवाद का उघड़ना व ढकना

आंध्र प्रदेश में कांग्रेस के लिए दिवाली अच्छे और बुर दोनों तरह के संदेश लेकर आई। अच्छी बात यह कि प्रदेश में पार्टी की सरकार ने अपने ही दो मंत्रियों के बीच उठ खड़े हुए विवाद को सुलझा लिया। बुरी यह कि इस मामले को सुलझाने और ठंडा पानी डालने की कोशिशें जनता का विश्वास जीत नहीं पाईं। वाईएसआर सरकार के दो मंत्रियों के बीच का विवाद हालांकि आंध्र प्रदेश की सीमा के भीतर का मामला ही था, पर उसका केन्द्रीय तत्व दक्षिण के चारों राज्यों से जुड़ा था। इन चारों राज्यों में नदियों के तल से और सागर तट से रत की अतिशय, और अक्सर अवैध, माइनिंग के खिलाफ आवाज उठती रही है। जनता का कहना है कि जमीन के नीचे पानी के स्तर में लगातार गिरावट की यह बड़ी वजह है। पर्यावरणविदों के अनुसार समु्द्री जीवन और पर्यावरणीय क्षरण का यह मुख्य कारण है। आंध्र प्रदेश में बालू के अवैध उत्खनन का विवाद दिवाली के करीब एक हफ्ते पहले ही शुरू हुआ। लघुउद्योग मंत्री जी. सूर्य राव ने आरोप लगाया कि उनके सहयोगी पंचायतराज मंत्री जे.सी. दिवाकर रड्डी इन अवैध गतिविधियों के सहार करोड़ों रुपए लूट रहे हैं। अगले रो राव ने कहा, यह रकम सात करोड़ रुपए है और उनके पास अपने आरोपों को साबित करने के प्रमाण हैं। पार्टी नेता जानते थे कि राव की बयानबाजी के पीछे इन दोनों मंत्रियों के बीच अर्से से चला आ रहा मन-मुटाव है। इतना साफ था कि इन आरोपों से सरकार की खासी फाीहत होगी। खासतौर से लोकसभा चुनाव करीब होने की वजह से एसी बातें पार्टी पर भारी पड़ेंगी। वरिष्ठ पार्टी नेताओं ने मुख्यमंत्री से अनुरोध किया कि वे पार्टी को कलंकित होने से बचाने के लिए फौरन हस्तक्षेप करं। राजशेखर रड्डी ने आरोपों की जाँच के लिए तीन सदस्यों की एक कमेटी बना दी। कमेटी के अध्यक्ष वित्तमंत्री के रोौया थे। उन्होंने तीन दिन के भीतर अपनी रिपोर्ट दे दी। इसमें कहा गया कि आरोपों में दम नहीं है। कमेटी ने सूर्य राव से लिखित रूप में क्षमा याचना-पत्र भी हासिल कर लिया। यह साफ है कि जाँच का उद्देश्य दो मंत्रियों के बीच के विवाद को निपटाना था, आरोपों की जाँच करना नहीं। पूर्व गोदावरी जिले में बालू के अवैध उत्खनन का आरोप लगाने वाले सूर्य राव पहले व्यक्ित नहीं हैं। ऐसे आरोप विपक्षी पार्टियाँ पहले से लगाती रहीं हैं। इन दोनों मंत्रियों के बीच कटुता महीनों पहले सार्वजनिक रूप से सामने आ चुकी थी। बल्कि अब तो सूर्य राव के रुख में अचानक आए बदलाव को लेकर सवाल उठाए जाने लगे हैं। वे तो अपने आरोपों के वापस लेने को तैयार ही नहीं थे। उनका दावा था कि उनके पास आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त प्रमाण हैं। विरोध दल तेलगु देशम् अब इस मामले में न्यायिक जाँच हाईकोर्ट के किसी वर्तमान जज से कराने की माँग कर रहा है। इससे तेदेपा के इरादे भी स्पष्ट होते हैं। यह पार्टी दस साल तक प्रदेश का शासन चला चुकी है। उसे अच्छी तरह पता है कि हाईकोर्ट किसी जज को जाँच के लिए मुक्त ही नहीं कर पाएगी। पार्टी की दिलचस्पी मामले को ज्यादा से ज्यादा खींच कर राजनैतिक लाभ उठाना है, अवैध उत्खनन पर से पर्दा उठाना नहीं। दोनों मंत्रियों के बीच के विवाद के बाद सरकार की दो साल पहले बनी बालू से सम्बद्ध नीति के बाबत सवाल भी उठे हैं। यह नीति नदियों के तल, तालाबों और भूगर्भीय जल के संरक्षण के लिए बनाई गई थी। राज्य के जल, भूमि और वृक्ष अधिनियम 2002 के अनुरूप इसे बनाया गया था। इसका लक्ष्य प्रदेश में वृक्षों की संख्या बढ़ाना और जमीन के नीचे और जमीन के ऊपर पानी के दोहन का नियमन है। इस नीति के तहत नदियों के तल से केवल मजदूरों के हाथों और बैलों की मदद से ही बालू निकाली जा सकेगी। बड़े स्तर पर अवैध उत्खनन की शिकायतों की पृष्ठभूमि में बनी इस नीति में यह भी कहा गया था कि खुदाई तीन मीटर से ज्यादा गहराई तक नहीं की जा सकेगी। इसके पहले ठेकेदार मशीनों का इस्तेमाल करके 15 मीटर तक की खुदाई करते थे। इसका उद्देश्य किसानों के हितों की रक्षा भी था, जो सिंचाई के लिए या तो नदियों पर आश्रित हैं या कुओं पर। पर्यावरणविद हालांकि मशीनों पर रोक लगने से खुश थे, पर उन्हें आशंका थी कि नई व्यवस्था की ठीक से मॉनीटरिंग नहीं हो पाई तो इसके लक्ष्य पूर नहीं होंगे। दोनों मंत्रियों के बीच के ता विवाद को देखते हुए कहा जा सकता है कि पर्यावरणविदों का अंदेशा गलत नहीं था। यह मसला कांग्रेस हाई कमान तक पहुंच गया है। नई रत उत्खनन नीति को लागू करने और उसके सहार पर्यावरण संरक्षण के बाबत वोटरों को आश्वस्त करने के लिए अब ठोस प्रयास करने होंगे। लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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