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मतलब निकल गया तो पहचानते नहीं!

मतलब निकल गया तो पहचानते नहीं! बिहार भाजपा पर यह पंक्ित सटीक बैठती है। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जब तक स्वस्थ थे इसके काम के थे। हर मौके पर उनकी पूछ थी। जिक्र था। मगर अस्वस्थ होते ही पार्टी ने उनको बिसार दिया। भाजपा की प्रचार रणनीति पर नजर डालने से तो यही लगता है। पिछले अप्रैल से प्रदेश भाजपा के चुनावी विज्ञापन अखबारों में छपने शुरू हुए जो अब तक जारी हैं मगर इनसे श्री वाजपेयी ओझल रहे। पुराने कार्यकर्ता इस पर गौर कर रहे हैं और दुखी हैं।ड्ढr ड्ढr ऐसे ही एक समर्पित और पुराने कार्यकर्ता के मुताबिक जब तक सत्ता हासिल करने में उपयोगिता दिखी वाजपेयी के नाम को भुनाया गया। बिना उनकी तस्वीर के हर विज्ञापन अधूरा होता था। उनको उम्मीदवारों की जीत का टकसाली सिक्का माना जाता था। एकदम खरा। मगर जैसे ही वह अस्वस्थ हुए और प्रचार के लिहाज से उनकी उपयोगिता कम हुई, ‘मतलब के यारों’ ने उनको दरकिनार कर दिया। अब तक के हवाई प्रचार के बार में छपे बिहार भाजपा के विज्ञापनों में एक में भी लोगों को अटल बिहारी वाजपेयी नहीं दिखे। एनडीए के पीएम इन वेटिंग लालकृष्ण आडवाणी की बिहार में अब तक तीन सभाएं हुईं हैं। एकाध बार को छोड़ दें तो लगभग सभी विज्ञापनों में उनकी तस्वीर छपती रही है। उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी तो हर विज्ञापन में ही छाए रहे हैं। कई बार तो अकेले ही। हेलीकाप्टर से दौर के विज्ञापनों में राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह और महासचिव अरुण जेटली की तस्वीरं भी छपीं। इनके साथ ही राज्य के नेताओं में पीएचईडी मंत्री अश्विनी कुमार चौबे और स्वास्थ्य मंत्री नन्दकिशोर यादव की भी कभी-कभार झलक मिलती रही। मगर श्री वाजपेयी तो भूले-बिसर गीत की तरह भी याद नहीं किए गए। अलबत्ता 23 अप्रैल को दिल्ली से एक विज्ञापन जरूर छपा जिसमें अटलजी की तरफ से आडवाणी को जीताने की अपील की गई दी।

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