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डबल डोचाडबल डोचाडबल डोचा

डबल डोड्ढr मंत्रीजी डबल डो के फेर में पड़ गए थे। वे सरकारी यात्रा पर दक्षिण बिहार के एक जिले में गए। पेट में तकलीफ महसूस हुई। आनन-फानन में कई डाक्टर हाजिर हो गए। मंत्री का मामला ठहरा। डाक्टरों ने होशियारी दिखाई। शत्तिर्या इलाज की तर्ज पर डाक्टरों की टीम काम करने लगी। तबीयत पहले से कहीं अधिक बिगड़ गई। वहां से पटना के बड़े अस्पताल में जांच कराने गए। पता चला कि हरक दवा की डबल डो दे दी गई है। मंत्रीजी ने बड़े अस्पताल के डाक्टर से आराू की-आप मेरा नहीं, मेरी पीड़ा का इलाज कीािए। डाक्टर ने ऐसा ही किया। मंत्रीजी चंगे हो गए।ड्ढr ड्ढr साम्यवादड्ढr छोटे सरकार को लोग नाहक ही दक्षिणपंथी और प्रतिक्रियावादी मानते हैं। सच यह है कि वे साम्यवादी विचारधारा के पोषक हैं। उनके सचिवालय स्थित सेल में वर्ग का फर्क मिट गया है। भरोसा न हो तो कभी मुआयना कीािए। कोई आदमी किसी की कुर्सी पर बैठ सकता है। यानी डिप्टी सेक्रेटरी रैंक के अफसर की कुर्सी पर अगर चौथे दज्रे का मुलाजिम बैठा नजर आ जाए तो समझ लीजिए यही उनका सेल है। यह अलग बात है कि छोटे सरकार तक इस सद्भाव की जानकारी नहीं पहुंची है। पहुंच भी जाए तो क्या? साम्यवाद से उन्हें परहेा हो सकता है। रामराज्य के तो हिमायती वह हैं ही।ड्ढr ड्ढr बदलाड्ढr कांग्रेस कोटे के केंद्रीय मंत्री निहायत सज्जन हैं। आम तौर पर नाराज नहीं होते हैं। पर, एक दिन नाराज हो गए। राज्य सरकार इन दिनों महान लोगों की पुरानी प्रतिमाएं हटाकर नई प्रतिमाएं स्थापित कर रही है। इनके शिलापट्ट भी बदले जा रहे हैं। नाराजगी इसीको लेकर हुई। उनका नाम एक शिलापट्ट से गायब हो गया। उन्होंने फोन पर बिहार सरकार के एक मंत्री को हड़काया-राज्य में हमारी सरकार बनी तो हम इस बात को याद रखेंगे। आपकी सरकार के किसी मंत्री का नाम शिलापट्ट पर नहीं रहने देंगे। मंत्री ने बुरा नहीं माना। केंद्रीय मंत्री की पार्टी की राज्य में सरकार बनने की संभावना नहीं है।ड्ढr ड्ढr ऐसे भी मंत्रीड्ढr मंत्री कैसे-कैसे होते हैं। मगर ऐसे भी होते हैं। कोसी से आनेवाले एक समाजवादी मंत्री कैसे हैं। देखिए। उस दिन जेनरल स्टोर में आम ग्राहकों की तरह खरीददारी कर रहे थे। मोलभाव भी कर रहे थे। दुकानदार और ग्राहकों ने उनकी ओर ध्यान नहीं दिया। तभी किसी परिचित की नजर उन पर पड़ी। वह चिल्ला उठा-मंत्रीजी आप हैं। मंत्रीजी ने चुप रहने का इशारा किया। दूसर ग्राहकों के परशान होने की बारी थी। सबने घूरना शुरु किया। दुकानदार भी चकराया-ये तो बराबर आते हैं। उस दिन मंत्री बिना पूरी खरीददारी किए लौट आए। डर था कि दुकानदार कहीं मुफ्त सामान देने की पेशकश न कर दे।

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  • Web Title: राजदरबारच