DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

राजनीति के ययाति

हा जाता है कि राजा दशरथ ने आईने में अपने सिर में एक सफेद बाल देखा तो वानप्रस्थ जाने और पुत्र को उत्तराधिकारी बनाने का फैसला कर लिया। लेकिन भारतीय राजनीति के धुरंधर आज कुर्सी के मोह में इस कदर जकड़े हैं कि युवाओं को आने का मौका नहीं देना चाहते। भले ही उनका दिल पेसमेकर से चलता हो या गुर्दा जवाब देने लगा हो, चलने या बैठने में अक्षम हों, सभाओं-बैठकों में सो जाएं या बात भूल जाएं, पर वे अपनी आखिरी सांस तक कुर्सी का मोह त्यागना नहीं चाहते। ययाति ग्रंथि से ग्रस्त नेताओं को देखकर ही यह कहा जाता है कि जहां दूसर देशों में नेतृत्व युवाओं के हाथों में आ रहा है, वहीं भारत में असली राजनीति 60 के बाद शुरू होती है। यहां विश्व में सबसे ज्यादा तादाद में नौजवान मौजूद होते हुए भी राजनीति में बूढ़े हावी हैं। फिलवक्त केंद्र से लेकर कई राज्यों के शीर्ष नेताओं की आयु 60 साल से ऊपर है। विभिन्न दलों के सहयोगी युवा संगठनों में भी 50 साल तक के ‘युवा’ जमकर बैठे हैं। यह भी गौरतलब है कि बूढ़ों की इस जमात में ज्यादातर नेता पुरुष ही हैं। युवाओं ही नहीं, हर उम्र की महिलाओं को भी संसद और विधानसभाओं से दूर रखने का वायदा निभाया जाता है। बूढ़े राजनेताओं का वरदहस्त हो तो कभी-कभार किसी शीर्ष राजनैतिक परिवार का कोई युवा उत्तराधिकारी के तौर पर भले ही सक्रिय राजनीति में आ जाए, पर उसका वहां होना दिखावा भर होता है। वृद्धों की सत्ता का इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है कि आसन्न विधानसभा चुनावों में टिकट बांटने वाले सभी प्राय: वृद्ध पुरुष हैं और अब तक जिन दलों की सूचियां आई हैं, उनमें ज्यादातर पार्टियां बूढ़े पुराने चेहरों पर दांव लगा रही हैं। हर सरकार की नीतियों और निर्णयों का सबसे दूरगामी असर महिलाओं और युवाओं पर होता है। प्राय: इन्हें सबसे पीछे धकेल कर एक तरफ राजनीति में युवा नेतृत्व न उभरने का रोना रोया जाता है और दूसरी तरफ हर बड़े पद पर बूढ़ों की बिरादरी उनका रास्ता रोक कर खड़ी रहती है। जब तक उम्रदराज लोग जगह खाली नहीं करंगे, तब तक युवा आकांक्षाओं से तालमेल बिठा सकने में समर्थ युवा नेता कैसे उभरंगे?

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title: राजनीति के ययाति