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गुब्बारों का फूलना और फटना

शब्द भ्रामक भी होते हैं। विशेष पृष्ठभूमि में उनके अर्थ खास होते हैं। ‘पूँजीवाद’ शब्द का अर्थ क्या है? मार्केट व्यवस्था या जहाँ मजदूर पैसा लेकर काम करते हैं या जहाँ बड़ी गैर-सरकारी कम्पनियों का सिक्का चलता है। इस अर्थ में पूँजीवाद के विरोध का अर्थ हुआ बाजार विरोधी व्यवस्था जहाँ बड़ी गैर-सरकारी कम्पनियों पर पाबंदी हो। पर पूँजीवाद इतना भर नहीं है। पूँजी का जन्म लेना, बढ़ना और आर्थिक गतिविधियों को चलाना ज्यादा महत्वपूर्ण है। यह पूँजी राज्य के पास हो तो क्या व्यवस्था समाजवादी हो जाएगी? ‘राज्य’ शब्द भी भ्रामक है। सरकार, राष्ट्र और देश की मिली-ाुली शक्ल हमें राज्य में नजर आती है। देश एक भौगोलिक इकाई है। राष्ट्र उसकी जनता का एक रूप है और सरकार एक संस्था है, जो लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में बदलती रहती है। अब हम सिविल सोसायटी जसे शब्दों का इस्तेमाल भी करने लगे हैं, जिसमें धार्मिक संस्थाएं, ट्रेड यूनियन, व्यावसायिक जगत, बल्कि मार्केट को शामिल कर सकते हैं। इन दिनों सारी दुनिया में आर्थिक और राजनैतिक मोर्चो पर जो हो रहा है, वह इसी सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक संरचना के अंर्तसबंधों का परिणाम है। रूस और चीन समाजवाद का रास्ता छोड़कर पूँजीवादी रास्ते पर जा रहे हैं। व्यावहारिक अर्थ में चीन और रूस में कम्युनिस्ट पार्टियों के जो ताकतवर लोग थे, उनके बच्चे ही बाजार के लीडर हैं। वैसे ही जसे हमार देश की राजनीति में शिखर पर बैठे लोग पुरानी सामंती पृष्ठभूमि के हैं। और जो आज शिखर पर आ बैठे हैं उनके बच्चों को ही इस देश को चलाना है। बाकी को राष्ट्र गीत गाना है। चीन में राज्य के नेतृत्व में बाजार व्यवस्था कायम हो रही है। उसका प्रदर्शन हाल में बीजिंग ओलिम्पिक के दौरान उसने किया। बाजार व्यवस्था का जकारा लग ही रहा था कि अमेरिका की बैंक-व्यवस्था के पिघलने की खबरं आने लगीं। अमेरिका और ब्रिटेन की सरकारों ने शेष व्यवस्था को डूबने से बचाने के लिए बड़े बेल-आउट पैकेा घोषित किए हैं। क्या यह समाजवाद की वापसी है? क्या यह बैंकों का राष्ट्रीयकरण नहीं? और सरकार ही व्यवस्था को चला सकती है तो निजीकरण की जरूरत क्या थी? हाल में एक प्रतिष्ठित अंग्रेजी पत्रकार ने लिखा, यह जो मेल्टडाउन वगैरह है वह मेरी समझ में आ नहीं रहा, और मुझे एसा कोई नहीं मिला जो कह सके कि उसे समझ में आ गया है। इस बयान में ईमानदारी है, साथ ही एक तरह की बेरुखी भी। हम वैश्विक बदलाव को देखने की कोशिश नहीं कर रहे हैं। अपनी छोटी सी दुनिया को स्थिर मानकर चलना चाहते हैं। वह स्थिर नहीं, निरंतर गतिशील है। दूसर विश्व युद्ध के बाद से संसार सागर में जबर्दस्त मंथन शुरू हुआ है। उपनिवेशों की समाप्ति के साथ एक नई दुनिया जन्म ले रही है। अंतरराष्ट्रीय गठाोड़ बढ़ रहे हैं। सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक और आर्थिक हर स्तर पर मनुष्य एक-दूसर के करीब आ रहा है। यह वैश्वीकरण है। इस गतिविधि का सबसे महत्वपूर्ण पहलू आर्थिक है। पूँजी की यात्रा। इसके राजनैतिक निहितार्थ हैं। पूँजी राजनैतिक शक्ित का महत्वपूर्ण कारक है। मेल्टडाउन से स्तब्ध होने के पहले सिर्फ छह महीने पीछे चलें। पिछली कुछ सदियों के भीषणतम खाद्य संकट ने दुनिया को घेर लिया। हमने उसे इसलिए महसूस नहीं किया, क्योंकि हमारी स्थिति बेहतर थी। हमने अन्न निर्यात पर रोक लगा दी। खुद को बचाया। इसी साल ग्लोबल वार्मिग पर वैज्ञानिकों की अंतरराष्ट्रीय रपट जारी हुई। इस वैश्वीकरण से हम बच नहीं सकते। अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद के निशाने पर बैठे महत्वपूर्ण देशों में हम भी एक हैं। इस आर्थिक संकट की बेला में हमारी स्थिति बेहतर है, क्योंकि हमार बैंकों के पास नकदी की कमी नहीं है। फिर भी इसके धमाके हमें झेलने होंगे। हम इस व्यवस्था से जुड़ चुके हैं। इसलिए इसके समाधान के लिए होने वाली कोशिशों में हमें भी शामिल होना होगा। समाधान क्या है राम जाने, अभी दुनिया यह भी नहीं जानती कि समस्या कितनी गहरी है। अमेरिका के वित्तमंत्री हेनरी पॉलसन ने वित्तीय संस्थाओं के लिए 700 अरब डॉलर का बेल-आउट प्लान रखा तो किसी ने पूछा, आपने किस तरह अनुमान लगाया कि 700 अरब डॉलर की जरूरत होगी। उन्होंने कहा, मुझे खुद नहीं मालूम। वित्त विभाग का कहना है, यह संख्या किसी डेटा पॉइंट पर आधारित नहीं है। पश्चिमी बैंकों का चालू हाल नियमन यानी रग्यूलेशन की कमी के कारण बना। पिछले तीन दशक से विश्व बैंक पर प्रभावी प्रसिद्ध वॉशिंगटन कंसेंसस अर्थव्यवस्था पर राज्य के नियंत्रण को कम से कम करते जाने के पक्ष में है। इससे आर्थिक विकास को गति भी मिली। फाइनेंशियल टाइम्स के मार्टिन वुल्फ ने लिखा है कि बीसवीं सदी के मध्य से मैनेजीरियल कैपिटलिज्म का विकास ग्लोबल फाइनेंशियल कैपिटलिज्म के रूप में होता चला गया। यह फाइनेंस वास्तविक माल और सेवाओं को तैयार करता तब भी ठीक था। इसने सट्टेबाजी की शक्ल अख्तियार कर ली। जितना जोखिम उतना फायदा। चूंकि इस व्यवस्था के पीछे राजनैतिक ताकत भी आती चली गई, इसने नियमन यानी रग्युलेशनों को खाना शुरू कर दिया। सन 2004 में अमेरिकी फाइनेंशियल सेक्टर का सकल कॉरपोरट मुनाफा 300 अरब डॉलर हो गया, जबकि समूचे गैर-फाइनेंशियल उद्योग का मुनाफा 534 अरब डॉलर था यानी कुल मुनाफे का 40 फीसदी फाइनेंशियल सेक्टर को मिला। साठ के दशक में फाइनेंशियल सेक्टर का मुनाफा करीब दो फीसदी होता था। पैसे से पैसा बनाने की नीति के कारण औद्योगिक आधार ढांचे का काम पिछड़ गया। समृद्धि के नशे में चूर व्यवस्था ने दूसरा वार रग्युलेटरों पर किया। बिल क्िलंटन के दूसर कार्यकाल 1से 2000 और उसके बाद जॉर्ज बुश के आठ साल में फाइनेंशियल मार्केट के नियमन का कानूनी ढाँचा कमजोर होता चला गया। सिक्योरिटीा एंड एक्सचेंज कमीशन की टीम घटकर 120रह गई जो अगले साल 1177 हो जाएगी। इससे बड़ी तादाद में वकील किसी फाइनेंस कम्पनी में होते हैं। पूँजीवादी, साम्यवादी और गांधी जसे अराजकतावादी भी अपने-अपने कारणों से राज्य की भूमिका को कम से कम चाहते हैं। ‘स्टेट विल विदर अवे’ कहने वाले माक्र्सवादियों को राज्य का सहारा है। नैतिक आदर्शवादी राज्य को साधन सम्पन्नों की ताकत और प्रभुत्व का प्रतीक मानते हैं। भारतीय परिस्थितियों में जहां जनता तकनीकी फैसलों को करने या समझ पाने में ही समर्थ नहीं लगती और जहाँ के पढ़े-लिखे लोग भी राज-व्यवस्था और अर्थ-व्यवस्था की पेचीदगियों को समझ न पा रहे हों, राज्य नियमन का आखिरी स्तम्भ नजर आता है। वह गुजरात, महाराष्ट्र, असम या उड़ीसा में अनुपस्थित रहता है। फिर भी हमें गोदो की तरह उसके आने का इंतजार करते हैं। आओ और हमें संकट से उबारो। लेखक हिन्दुस्तान, दिल्ली संस्करण के वरिष्ठ स्थानीय संपादक हैं।ं

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