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ऋण नीति नरम या गरम

हम हैं न कमाल के.. पेयजल के स्रेत न केवल सीमित होते जा रहे हैं, बल्कि जो बचे हैं वे हानिकारक रसायनों और धातुओं की बढ़ती मात्रा के कारण पीने के काबिल नहीं रहे। पिछले दिनों खबर छपी थी कि दिल्ली के द्वारका क्षेत्र में कुओं के पानी में सीसे (लेड) की मात्रा इतनी ज्यादा है कि पानी पीने के काबिल बिल्कुल नहीं। लगता है वह समय दूर नहीं जब लोग प्यास से मरने की बजाय प्रदूषित पानी पी कर ज्यादा मरंगे। वायु प्रदूषण की बात चलती है, हवा साफ नहीं, तरह तरह के हानिकारक तत्व हवा में हैं, दमा-खांसी के रोग बढ़ रहे हैं, मगर जसे ही दीपावली का पर्व आया नहीं कि पूर वर्ष भर का वायु प्रदूषण हम स्वयं पटाखे चला चला कर पूरा कर देते हैं। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि हम आस्था-विश्वास को बरकरार रख कर पर्वो को मनाने के विधि-विधान में कुछ परिवर्तन लाएं? पूजा भी हो जाए और पर्यावरण भी दूषित न हो। डॉ. आर. के. मल्होत्रा, नई दिल्ली हरदम हारता रहा है.. हम नदी को भी मां मानते और दुर्गा, गणेश, विश्वकर्मा को भी पूजते हैं। नदी की साफ-सफाई पर करोड़ों रुपया फूंकते हैं। पहले भी दुर्गा पूजा, जन्माष्टमी और गणेश विसर्जन होता था। प्राकृतिक रंग से रंगी मूर्ति किसी को भी प्रदूषित नहीं करती थी। वहीं दूसरी तरफ लाखों रुपए के पटाखे छोड़ सार्वजनिक जगहों पर लगे धूम्रपान पर रोक की धज्जियां उड़ा गया। क्या यह वायु प्रदूषण को बढ़ावा देने में सहायक नहीं हैं? हम दिखावे में विश्वास करते हैं। आस्था के साथ खिलवाड़ करते हैं। वायुमंडलिक प्रदूषण पर शोर मचाते हैं। बेचारा ‘राम’ वास्तव में हार जाता है क्योंकि ‘रावण’ अब ज्यादा शक्ितशाली हो चुका है। पवन कुमार झा, शालीमार बाग, नई दिल्ली गृह प्रदेश में हो परीक्षा केंद्र विगत दो वर्षो से उत्तर प्रदेश में बी. एड. प्रवेश परीक्षा के केन्द्र उन्हीं महानगरों में होते हैं जिनमें विश्वविद्यालय हैं। इस व्यवस्था में छोटे शहर, कस्बों तथा गांवों से आने वाले परीक्षार्थियों को खासी परशानी होती है। हाारों की संख्या में परीक्षार्थी महानगर पहुंचते हैं यदि यही व्यवस्था छोटे शहरों में भी हो तो सिर्फ परीक्षा कराने वाले कुछ ही लोगों को आना पड़ेगा। इस तरह हाारों लाखों का पेट्रोल, धन तथा समय बचेगा। 10-08 को मेरठ में बी.एड. परीक्षा का आयोजन हुआ उस दिन मेरठ में भीड़ देखते ही बनती थी। कृष्ण कुमार वर्मा, गाजियाबाद, उ.प्र.ं

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