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ब्लॉग वार्ता : ठन-ठन ठाकरे, भन-भन भैया

राज ठाकरे के प्रतिकार में एक अजब किस्म का प्रांतवाद हिंदी ब्लॉग जगत में फैला हुआ है। ठाकरे और भैया दोनों एक-दूसरे से खुंदक खाए हुए हैं। ठाकरे ठेला-विरोधी हैं। ठेला वाले भैयों को भगा देना चाहते हैं। मुंबई में बड़े पदों पर बैठे दूसरे राज्यों के अफसरों का वो क्या बिगाड़ लेंगे। न उनके चाचा बिगाड़ पाए न भतीजा बिगाड़ पाएगा। लोकतंत्र में वोट और भोंपू पर सबका अधिकार है। भोंपू लेकर जो बोलना है बोल दीजिए। राज ठाकरे को भोंपू मिल गया है। द्धह्लह्लश्चज् ह्यह्लड्डह्लद्गद्भद्धड्डrद्मद्धड्डठ्ठस्र्.ड्ढद्यoद्दह्यश्चoह्ल.ष्oद्व क्िलक कीािए। झारखंड नाम के इस ब्लॉग पर राज ठाकर को जवाब दिया जा रहा है। विश्व स्तरीय कोयला झारखंड पैदा करता है। हम मुंबई को क्यूं दें? विश्व स्तरीय लोहा, अभ्रक, तांबा, यूरनियम आदि दर्जनों खनिज पदार्थ झारखंड में पाए जाते हैं। जिसका मुख्यालय दूसर राज्यों में हैं। इसका मुख्यालय झारखंड में आ जाए तो कम से कम तीन लाख लोगों को नौकरी झटके से मिल जाएगी। प्रतिक्रिया में विवेक गुप्ता लिखते हैं कि मुंबई के लोग सब्जी तक उगा नहीं पाते लेकिन नखर बहुत करते हैं। जब मुख्यालय स्थानांतरित हो जाएंगे तब समझ में आएगा। एक ब्लॉग ने तो नारद और श्रीराम की कथा का रूपक इस्तेमाल किया है। मुंबई लोकल में श्रीराम भय से नारद को नहीं बताते कि वे ही राम हैं।द्धह्लह्लश्चज् 1न्द्मड्डह्यद्धद्मड्डड्ढद्यoद्द.ड्ढद्यoद्दह्यश्चoह्ल.ष्oद्व पर विकास अपनी चिंताओं को कहानियों में व्यक्त कर रहे हैं। इस कहानी में नारद राम से पूछते हैं हे नारायण मुकुट की जगह गमछा! क्या बात है। श्रीराम कहते हैं कि अब जमाना बदल गया है। अब मैं ठहरा उत्तर प्रदेश का भैया और तुम्हारी मैया ठहरी बिहारिन। अब अगर ये बात किसी को पता लग गई तो बेमतलब बेइज्जती हो जाएगी मेरी। अब हम दोनों कोई मराठी माणूस तो हैं नहीं। सो थोड़ा बच के रहना पड़ता है। किसी से क्यूं पंगा लें? वैसे भी सार दिव्यास्त्र तो रावण पे बरबाद हो गए। इसलिए हमने एडास्ट करना सीख लिया है। विकास के इस व्यंग्य का मतलब है कि राज ठाकर महाराष्ट्र से क्या-क्या निकालेंगे? ऐसे नेताओं की बातों पर लोग भी बड़बड़ाने लगते हैं। ब्लॉगर भी बड़बड़ा रहे हैं। द्धह्लह्लश्चज् द्वड्डठ्ठorन्ड्ड.ड्ढद्यoद्दह्यश्चo.ष्oद्व पर प्रदीप मानोरिया कविता ही लिखने लगते हैं। गुजरात या उत्तर का या फिर कन्नड वासी है। सब मिलजुल कर प्रेम से रहते सब ही भारतवासी हैं। राज ठाकर के इस बवाल ने लोगों को कवि से लेकर नेता बना दिया है। द्धह्लह्लश्चज् श्चrड्डह्यड्डस्र्द्धड्डrह्यद्धड्ड.ड्ढद्यoद्दह्यश्चoह्ल.ष्oद्व पर मुंबई में रहने वाले हर्षा प्रसाद किसी ई-मेल के बहाने राज ठाकर को घेरते हैं। लिखते हैं कि मुंबई के बच्चों पढ़ो मत। सेकेंड क्लास आए तो कोई बात नहीं। दूसर बच्चे को लाठी से मार कर भगा देना। संसद में सिर्फ दिल्लीवासी होंगे क्योंकि संसद भवन दिल्ली में है। मुंबई में कोई हिंदी फिल्म नहीं बनेगी। सिर्फ मराठी फिल्में बनेंगी। हर राज्य की सीमा पर रलवे के स्टाफ बदल जाएंगे। ताज महल देखने का अधिकार सिर्फ उत्तर प्रदेश के लोगों को मिलेगा। ऐसी दलीलों से ठाकर की ठठाई हो रही हे। हंसा जा रहा है। इस तरह के एसएमएस या ई-मेल आरक्षण के वक्त भी काफी घूमते हैं। द्धह्लह्लश्चज् ड्ढड्डड्डह्ल-ड्ढद्ग-ड्ढड्डड्डह्ल-ड्डह्लह्वद्य.ड्ढद्यoद्दह्यश्चoह्ल.ष्oद्व पता है चौपाल ब्लॉग का। राजस्थान के कोटा शहर के अतुल चतुव्रेदी तो राज ठाकर के नाम खुला खत लिख बैठे हैं। खत में कविता है और कविता में कहते हैं: विभिन्नता में एकता की कहानी खो गई,ड्ढr तरक्की के दौर में, रिश्तों की जवानी खो गईड्ढr हर तरफ फैला है, कैसा मंजर यह दोस्तो,ड्ढr कहीं भाषा, कहीं जाती का खंजर दोस्तोंड्ढr इन्हें न शर्म है न लाज,ड्ढr अबे, ओ राज! मत बजा बेसुरा साज हर ब्लॉगर मराठी बनाम गैर मराठी मुद्दे पर अपने ही भीतर भिड़ा हुआ है। अनिल कुमार वर्मा अपने ब्लॉग संवेदना पर राज ठाकर को चेतावनी दे रहे हैं। जब लगता है कि राज चेतावनी से नहीं मानेगा तो समझाने लगते हैं। द्धह्लह्लश्चज् ह्यड्डद्व1द्गस्र्ठ्ठड्ड-ह्यड्डद्व1द्गस्र्ठ्ठड्ड-ड्ढद्यoद्दह्यश्चoह्ल.ष्oद्व पर अनिल लिखते हैं राज जरा समझो इस बात का। जो सक्षम है, वो भला अपना सब कुछ छोड़कर मुंबई क्यों जाएगा और अगर वहां जाने वाला कमजोर है तो भला वो मराठी अस्मिता को नुकसान कैसे पहुंचा सकता है। अगर वो ऐसा करने में सक्षम नहीं है तो फिर क्यों एमएनएस के लोग उनके साथ जानवरों जसा सलूक करते हैं। राज ठाकर की बद- राजनीति पर सिर्फ नेताओं के ही सुर नहीं सुनाई दे रहे हैं। शायद इसी मानसिक परशानी ने राहुल राज को राज ठाकर को सबक सिखाने के लिए बहका दिया होगा। राहुल राज की तरह मुंबई पुलिस भी भीतर-भीतर बहक रही होगी। कौन जानता है इस मुद्दे पर पुलिस के लोग क्या सोचते हैं। खुद को पुलिस समझते हैं या मराठी।ड्ढr ड्ढr लेखक का ब्लॉग है ठ्ठड्डन्ह्यड्डस्र्ड्डद्म.ड्ढद्यoद्दह्यश्चoह्ल.ष्oद्व

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