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18 जनवरी, 2020|12:38|IST

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सैनिक पर संदेह

मालेगांव विस्फोट कांड की परत-दर-परत खुलती जा रही हैं और उसमें संलिप्तता के जो नाम सामने आए हैं, वे चौंका देने वाले हैं। पहले साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर संदेह के घेर में आईं, जिसकी गिरफ्तारी और जांच में खुलासा हुआ कि अतिवादी हिन्दू संगठन के चंद लोगों का इस कांड में हाथ था। बाद में इस सिलसिले में तीन पूर्व सैनिक और दो पूर्व सैन्य अधिकारी- समीर कुलकर्णी और रमेश उपाध्याय गिरफ्तार किए गए। लेकिन, अब सेना के एक लेफ्टिनेंट कर्नल श्रीकांत पुरोहित की गिरफ्तारी और जांच के तथ्यों ने बेहद चिंताजनक सवाल खड़े किए हैं। ये सभी गिरफ्तार लोग एक-दूसर के संपर्क में थे और इन्होंने विस्फोट को अंजाम दिया। जहां साध्वी प्रज्ञा की लिप्तता आतंकवाद के एक नए आयाम यानी बहुसंख्यक हिन्दुओं के अतिवादी संगठन की आंतकी हिंसा को इंगित करती है, वहीं पुरोहित की भूमिका ने सरकार और सेना दोनों के लिए गंभीर चिंताएं पैदा की हैं। पुलिस और एक हद तक सीमा सुरक्षा बल पर भ्रष्ट-सांप्रदायिक आचरण के आरोप लगते रहे हैं, पर सेना की छवि पेशेवर और निष्पक्ष रही है। इसी बेदाग छवि के चलते जनता उसे सदैव आदर से देखती रही है। सांप्रदायिक दंगा हो या प्राकृतिक आपदा, बड़े आदर के साथ सेना की मदद ली जाती है। सही है कि सिर्फ एक सैनिक अधिकारी के शक के दायर में आने पर पूरी सेना दागदार नहीं हो जाती। फिर भी, मालेगांव कांड में कुछ पूर्व सैनिकों और एक आला सैन्य अधिकारी की लिप्तता ने सेना में घिनौने सांप्रदायिक और आतंकवादी वायरस के प्रवेश को उाागर किया है। जब कई असामाजिक-आतंकवादी तत्व विध्वंसक करतूतों से भारतीय राष्ट्र-राज्य को कमजोर बनाने में लगे हों, तब ऐसी घटना सामने आना बेहद गंभीर बात है। पर्याप्त साक्ष्य जुटाकर इस मामले को उसकी तार्किक परिणति तक ले जाया जाना चाहिए, तभी दोषियों को दंड मिल सकेगा और पूरी तस्वीर भी साफ होगी। पकड़े गए लोगों को लेकर भाजपा उनके बचाव में उतरी है, जबकि अन्य दल अपनी बांह चढ़ा रहे हैं। आतंकवाद जसे संगीन मसले पर राजनीतिक दलों को संकीर्ण राजनीति करने से बाज आना चाहिए। सेना की भर्ती, प्रशिक्षण और उसके ढांचे में पर्याप्त सतर्कता बरतने की भी जरूरत है।

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  • Web Title: सैनिक पर संदेह