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हर दौर का बागबान

फिल्मकार बलदेव राज चोपड़ा ने दुनिया को उस समय अलविदा कहा है, जब वे हमें सबसे ज्यादा प्रासांगिक लगने लगे थे। अप्रसांगिक तो खर वे कभी हुए ही नहीं। ‘अफसाना’ से ‘बागबान’ तक कभी नहीं। इस बीच आधी से ज्यादा सदी बीत गई, जमाना बदल गया, कलाकार बदल गए, साज और आवाज बदल गए, फिल्म की तकनीक बदल गई, पूरी तीन पीढ़िया गुजर गईं, पर एक बी. आर. चोपड़ा का जादू था, जो नहीं बदला। ‘नया दौर’ उन्होंने उस समय बनाई जब गांव कस्बों की ठहरी सी जिंदगी में तकनीक ने दस्तक दी, तो ‘मजदूर’ में उन्होंने भारतीय मध्यवर्ग के वामपंथी सपनों को एक नया रंग दिया, और फिर इक्कसवीं सदी में बनी ‘बागबान’ की कहानी जब अपने गम में उलझी नई पीढ़ी को अपने मां-बाप की सुध लेने तक फुरसत नहीं है। दौर कोई भी रहा हो बी. आर. ने अपनी फिल्मों में सामाजिक सरोकार को कभी नहीं छोड़ा। ‘एक ही रास्ता’ में विधवा विवाह की बात करते हैं, ‘साधना’ में वेश्याओं के पुनर्वास की तो ‘निकाह’ में मुस्लिम समाज विवाह कानून का सवाल उठाते हैं। एसा करते हुए बी. आर. चोपड़ा ने नारबाजी का सस्ता मनोरांन कभी नहीं किया। फिल्म बनाते समय उनका हाथ अगर उस दौर की नब्ज पर होता था तो नजर लोगों की पसंद-नापसंद पर। इसका सबसे अच्छा उदाहरण टेलीविजन धारावाहिक ‘महाभारत’ रहा, जिसे उन्होंने अतीत एक ऐसी कथा के रूप में पेश किया, जो हमार वर्तमान की ही कहानी लगती है। बी. आर. चोपड़ा ने इसकी कथा राही मासूम राा से लिखवाई थी। लेकिन यह पहला मौका नहीं था, जब उन्होंने किसी प्रतिष्ठित साहित्यकार को अपने काम में जोड़ा हो, एक लंबे समय तक उन्होंने लगातार साहिर लुधियानवी से गीत लिखवाए। ये सिर्फ उदाहरण हैं कि गीत और पटकथा उनके लिए कितने महत्वपूर्ण रहे। इस दौर में जब मनोरांन एक बहुत बड़ा उद्योग है और आमतौर पर फिल्मों की पटकथा इसके बाकी ग्लैमर के सामने सहमी, सकुचाई सी लगती है। बी. आर. चोपड़ा का नाम हमे बताता है कि लगातार हिट रहने का फामरूला प्रस्तुति के साथ कथावस्तु के कसाव से ही निकलता है।

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