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इस्तीफे का दबाव

बिहार से जनता दल (एकीकृत) के पांच सांसदों के इस्तीफे के साथ मराठी बनाम बिहारी मानुष विवाद पर गंभीर राजनीतिक दांव शुरू हो गए हैं। जनता दल(एकीकृत) के इन सांसदों ने यह इस्तीफा राष्ट्रीय जनता दल से पहले और उसे पार्टी अध्यक्ष के बजाय लोकसभा के महासचिव को दिया है। इस तरह उन्होंने राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद को गंभीर कदम उठाने की चुनौती दे दी है। लालू प्रसाद जो 15 नवंबर तक बिहार के सभी सांसदों और विधायकों के इस्तीफे अपने पास मंगा रहे हैं, अब उन्हें उससे आगे खुलकर आना होगा। उनका दांव लोकसभा को बचाते हुए बिहार विधानसभा को भंग कराने का है ताकि वे खुद सत्ता में रहते हुए नीतीश को सत्ता से हटा कर अगला आम चुनाव लड़ सकें। जबकि जनता दल (एकीकृत) बिहार की सरकार को बचाते हुए इस्तीफे को केंद्र पर दबाव का हथियार बना रही है। यहां लालू और नीतीश की पार्टियां बिहार के स्तर पर वैसी ही राजनीति कर रही हैं, जसी बाल ठाकर और उनके भतीजे राज ठाकर महाराष्ट्र के स्तर पर कर रहे हैं। पार्टियों के अल्पकालिक राजनीतिक हितों को ध्यान में रख कर बिहार की तरफ से शुरू हुई इस्तीफे की यह राजनीति राज ठाकर की तरफ से चल रही हिंसा की राजनीति से किसी कदर बेहतर है। बिहार में युवाओं से नाहक स्टेशन और ट्रेन जलवाने के बजाय अब उनके राजनीतिक प्रतिनिधि खुद त्याग और संघर्ष की दिशा में बढ़ रहे हैं। यह तनाव घटाने का एक तरह का सेफ्टी वाल्व भी है और संघीय प्रणाली की लाचारी की तरफ उंगली उठाने का एक तरीका भी। संघीय ढांचे को स्वस्थ बनाने के लिए राज्य की स्वायत्तता आज इस कदर बहाल हो गई है कि उड़ीसा, कर्नाटक, असम और महाराष्ट्र जसे राज्यों में धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों पर अत्याचार रोकने में केंद्र की कोई भूमिका ही नहीं दिखाई पड़ रही है। इस ढांचे की एक और महत्त्वपूर्ण संस्था सुप्रीम कोर्ट मामले को राजनीतिक दलों पर डाल रही है और राजनीतिक दल अपने सबसे बड़े मंच संसद और विधानसभा से बाहर निकल कर मसले से कतरा रहे हैं। एसे में कांग्रेस और भाजपा जसे राष्ट्रीय दलों और संसद और सुप्रीम कोर्ट जसी संघीय संस्थाओं को सक्रियता दिखानी होगी।

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