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इज्जत के नाम पर

इज्जत के नाम पर भाई द्वारा दो बहनों की हत्या स्त्री को लेकर एक ठहर हुए समाज की विकृत मानसिकता दर्शाती है। राजधानी से सटे ग्रेटर नोएडा में इस जघन्य हत्याकांड का घटना शर्मनाक है। इज्जत के नाम पर अपने परिवार के सदस्यों की हत्या कर देना खुद हत्यारों को भले ही ‘सम्मानजनक’ लगता हो, पर एसे कारनामों से देश तथा समाज की इज्जत भी मिट्टी में मिल जाती है। कानून की नजर में परिवार के परिवार अपराधी बनते हैं सो अलग। इससे पहले भी अंतर्जातीय ही नहीं, सजातीय प्रेम विवाह करने पर भी नवविवाहित जोड़ों को या किसी एक को मौत के घाट उतारने की घटनाएं होती रही हैं। बुजुर्गो की बजाय अपने आप ठहराए विवाहों या प्रेम संबंधों को भारत में प्राय: स्वीकृति नहीं दी जाती और जातीय पंचायतें अक्सर आग में घी डालने का काम करती हैं। महिलाओं को घर की इज्जत बताकर घर की मर्यादा की गठरी का सारा बोझ उनके सिर लाद दिया जाता है और जरा सी चूक या नादानी पर परिवार के लोग ही स्त्री के दुश्मन बनकर उसकी जान लेने में नहीं हिचकते। क्या पुरुषों के आचरण पर भी घर की इज्जत नहीं टिकी होती? पर अगर लड़का घर से भाग गया होता तो उसकी बहनें या परिवार के सदस्य उसे कतई एसी हिंसा का शिकार न बनाते। लड़के को ढूंढकर लाने के लिए तो इनामी विज्ञापन दिए जाते हैं कि तुम लौट आओ, कोई कुछ न कहेगा। लड़के और लड़की के लिए दोहर मानदंड क्यों? लड़कियां जब घर से बाहर निकलेंगी और स्कूल-कालेज में लड़कों के साथ पढ़ेंगी तो आपस में दोस्ती स्वाभाविक है। किसी से दोस्ती या प्यार कोई एसा गुनाह नहीं है कि उसके लिए किसी की जान ले ली जाए। दोस्ती या प्यार के पात्र सही हों यह आवश्यक है। बचपन से ही लड़के-लड़कियों की परवरिश इस तरह हो कि साथ पढ़ने या खेलने पर उनके बीच स्वस्थ दोस्ती पनपे। अभिभावक उनकी बात सुनें, समझें और जिंदगी की ऊंच-नीच के बार में उन्हें समय-समय पर बताते रहें। वे अपने बच्चों का भरोसा जीतें ताकि वे अपने मन की बात खुलकर मां-बाप से कह पाएं। बच्चे अगर कोई गलती करते हैं तो उन्हें सलाह दी जानी चाहिए। गोली मार देना तो समस्या का समाधान नहीं।ं

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