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घर-घर में पुरानी सास-बहू

मामला अगर एक-दो दिन में नहीं निबटा तो दर्शकों को कुछ दिनों तक अपने प्रिय सीरियलों के पुराने एपीसोड ही देखने पड़ेंगे। कई हफ्तों से टीवी सीरियल प्रोडय़ूशरों और सिने-टीवी वर्करों के बीच जंग चल रही है। इस वजह से सीरियलों की शूटिंग बिल्कुल बंद है और चैनलों के पास मौजूदा सीरियलों के नए एपीसोड नहीं बचे हैं। प्रोडय़ूसरों और वर्करों की लड़ाई वर्करों की मजदूरी बढ़ाने की मांग को लेकर है। प्रोडय़ूसर उन्हें ज्यादा देने को तैयार नहीं हैं। वर्कर अड़े हैं कि मजदूरी जब तक नहीं बढ़ेगी, वे शूटिंग नहीं होने देंगे। स्टारप्लस, सोनी, जीटीवी , कलर्स जसे कई चैनलों को समझ मे नहीं आ रहा है कि क्या करं। इन चैनलों ने टीवी प्रोडय़ूसरों से कहा है कि वे नवंबर तक वर्करों के साथ अपने झगड़े को सुलझा लें वरना वे उन्हें आगे के एपीसोड के लिए पैसे देने की स्थिति में नहीं होंगे। गुरुवार को प्रोडय़ूसरों की यूनियन ‘एमपीटीटी’ (एसोसिएशन ऑफ मोशन पिक्चर्स एंड टेलीविजन प्रोडय़ूसर्स) और वर्करों के संघ ‘फ्वाइस’ (फेडरशन ऑफ वेस्टर्न इंडिया सिने एम्प्लाइज) के अध्यक्ष धर्मेश तिवारी के बीच हुई मीटिंग में कोई नतीजा नहीं निकला। उम्मीद थी कि शुक्रवार को कुछ नतीजा निकलेगा लेकिन वह भी नहीं हुआ। बैठक में प्रोडय़ूसरों ने साफ कहा कि वे मजदूरों (सेट बनाने वाले, सामान उठाने वाले ,अन्य तकनीशियनों और सेट पर अन्य कामों में लगे मजदूर) की दिहाड़ी में बढ़ोतरी करने की स्थिति में नहीं हैं। मुंबई टीवी इंडस्ट्री के सूत्रों ने बताया कि शूटिंग बंद होने की वजह से चैनलों के पास कई लोकप्रिय सीरियलों के नए एपीसोड नहीं बचे हैं। इससे उन्हें करोड़ों के विज्ञापन नहीं मिलेंगे। ज्यादातर मौकों पर टीवी प्रोडय़ूसरों को 10 से 15 एपीसोड एडवांस में चैनलों को जमा करने होते हैं लेकिन अब चैनलों के पास एपीसोड के बैंक खत्म हो गए हैं। तिवारी ने ‘हिन्दुस्तान’ को बताया कि इस मंहगाई के जमाने में अगर मजदूरों को पेट भरने के लिए पैसे न मिलें तो काम करने का क्या फायदा?

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