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विधायकों को भी अब ‘लालबत्ती’ जल्द

अपनी कुर्सी को लेकर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री मेजर जनरल बीसी खंडूरी अब आश्वस्त नजर आते हैं। पार्टी आलाकमान साथ है, असंतुष्टों को मनाने की रणनीति बन चुकी है। उन्हें हवा दे रहे पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी को राज्यसभा भेजने का फैसला कर पार्टी आलाकमान ने अपनी मंशा भी साफ कर असंतुष्टों को संकेत दे दिए हैं। इसी के साथ कुछ महीनों से चल रही राजनीतिक अस्थिरता का माहौल लगभग खत्म हो गया है और मुख्यमंत्री खंडूरी राज्य के विकास के प्रति नए सिर से जुटने जा रहे हैं। असंतुष्टों को मनाने के फामरूले पर अमल कब करंगे? अस्थिरता तो थी ही नहीं। हां, हमार साथियों को कुछ शिकायतें जरूर थीं, जिन्हें सुलझा लिया गया है। जो कमियां अभी बाकी हैं, उन्हें भी दूर कर दिया जाएगा। असंतुष्टों के लिए फामरूले जैसी कोई बात तो नहीं है। लेकिन इतना जरूर है कि पहले पार्टी आलाकमान ने तय किया था कि विधायकों और पार्टी टिकट पर चुनाव लड़ चुके लोगों को निगमों-बोडरे के अध्यक्ष पद देकर लालबत्ती से नहीं नवाजा जाएगा। बल्कि इन पदों पर ऐसे कार्यकर्ताओं को मौका दिया जाएगा जो पार्टी के लिए समर्पित रहे हैं और विधायक नहीं हैं या उन्हें टिकट ही नहीं मिल पाया है। लेकिन अब आलाकमान ने विधायकों को भी ऐसे पद देने पर सहमति प्रकट कर दी है। इसके लिए क्या मंत्रिमंडल में फेरबदल किया जाएगा? अभी ऐसी कोई योजना नहीं है, अलबत्ता हम कुछ विधायकों को कुछ लालबत्ती वाले पद देने पर विचार कर रहे हैं। इसके लिए मैकेनिज्म तैयार किया जा रहा है। इसमें कुछ और समय लगेगा। जो पहले से हैं उनकी कुर्सी सुरक्षित रहेगी या उसमें भी नए सिर से फेरबदल किया जाएगा? अभी इस पर फैसला नहीं हुआ है। लेकिन जरूरत पड़ी तो फेरबदल कर सकते हैं। हम देखेंगे कि कितने लोगों को एडजस्ट करना है और कैसे करना है। क्या कोश्यारी को राज्यसभा भेजना भी असंतुष्टों से निपटने की रणनीति का हिस्सा है? नहीं, यह पार्टी आलाकमान का फैसला है। राज्यसभा में उन लोगों को भेजा जाता है, जिन्होंने पार्टी के लिए लंबा योगदान दिया हो। कोश्यारी जी के योगदान पर कोई संदेह नहीं। उत्तराखंड की राजधानी को लेकर दीक्षित आयोग की सिफारिशों पर अमल कब तक होगा? इसमें देरी हुई है। मैं स्वीकार करता हूं। बहरहाल अब दीक्षित आयोग ने अपनी रिपोर्ट सौंप दी है। उसने व्यापक अध्ययन करके कई शहरों के नाम राजधानी के लिए सुझाए हैं। अभी मैं इन नामों का खुलासा करना नहीं चाहता। लेकिन इन्हें जल्द कैबिनेट में ले जाएंगे और उसके बाद राजधानी का फैसला होगा। लेकिन उत्तराखंड क्रांति दल चाहता है कि राजधानी गैरसैंण ही बने? हमने उत्तराखंड क्रांति दल से समर्थन जरूर लिया है। लेकिन पहले ही नियम-शर्ते तय कर रखी हैं कि किस मामले में उसका कितना दखल रहेगा। इसलिए राजधानी को लेकर उत्तराखंड क्रांति दल का कोई दबाव नहीं चलेगा। आपकी सरकार ने एनडी तिवारी सरकार के कार्यकाल को लेकर दो जांच समितियां बिठाई थीं, इनकी रिपोर्ट कब तक मिलेगी? ये दोनों जांच कमीशन इंक्वारी एक्ट के तहत हुई थीं। इसलिए निष्पक्ष तरीके से दोनों जांच हो रही हैं। अब तक रिपोर्ट आ जानी चाहिए थी। लेकिन इसमें थोड़ा विलंब हो गया है। जांच रिपोर्ट का हम भी इंतजार कर रहे हैं। आते ही कार्रवाई की जाएगी। केंद्र में कांग्रेस की सरकार है, ऐसे में राज्य सरकार को अपेक्षित सहयोग मिल रहा है या नहीं? नहीं, हमें केंद्र से जरूरी सहयोग नहीं मिल रहा है। केंद्र सरकार ने खाद्यान्न में कटौती कर दी है। एनडीए सरकार में राज्य को 18 हजार टन खाद्यान्न मिलता था जिसे घटाकर 1500 टन कर दिया है। हमार विरोध करने पर इसे कुछ बढ़ाकर पांच हजार टन किया गया। लेकिन यह बेहद कम है। इससे राज्य में एपीएल के लोगों को जरूरी खाद्यान्न नहीं मिल पा रहा है। रसोई गैस की आपूर्ति भी कम कर दी गई है। इसके अलावा राज्य के विशेष आर्थिक पैकेज की सीमा भी 2013 से घटाकर 2010 कर दी है। हमने इस मुद्दे को प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री के समक्ष उठाया था लेकिन चूंकि राज्य में भाजपा सरकार है, इसलिए कोई सहयोग नहीं मिल रहा।

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