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अपसंस्कृति का प्रवेश रोकें : तिर्की

बूटी और बड़गाई बस्ती की सीमा पर नौ नवंबर को पारंपरिक देवोत्थान जतरा मेला संपन्न हुआ। मेले में आसपास के गांवों के हजारों ग्रामीण शामिल हुए। देर रात तक चले मेले में ग्रामीण मिठाइयों, साज-सज्जा और श्रंगार के सामान और ईख के साथ ही साथ मौसमी फलों की जम कर बिक्री हुई। बच्चों ने झूलों का आनंद उठाया, तो युवा नागपुरी गीतों की धुन पर थिरकते रहे। यहां लोक नृत्यों की प्रतियोगिता भी हुई। इसमें सात अखाड़े शामिल हुए। बांधगाड़ी के अखाड़े ने सबका मन मोहा।ड्ढr वर्ष 1में जूठन महतो एवं मकूल पहान द्वारा कार्तिक एकादशी के मौके पर देवों को जगाने के लिए शुरू किये गये मेले के मौके पर महादेव मंदिर स्थित देवस्थल पर सुबह से ही श्रद्धालुओं की भीड़ लगी थी। पूजा के बाद श्रद्धालुओं ने मेले का आनंद लिया। गांवों की महिलाओं ने सुबह में भगवान शिव की पूजा पारंपरिक मंदिर में की। जतरा में पहानटोली बड़गाई, बांधगाड़ी, डंगरी टोली, गाड़ी होटवार, मुंडा टोली आदि गांवों की नृत्य टोलियों ने पारंपरिक नृत्य का प्रदर्शन किया। मेले का विधिवत उद्घाटन झाजम नेता रतन तिर्की ने किया। उन्होंने कहा कि जतरा का आयोजन झारखंडी एकता एवं परंपरा का ऐतिहासिक प्रतीक है। इसमें अपसंस्कृति का अनावश्यक प्रवेश रोकें। जतरा के मुख्य संरक्षक डॉ रुद्रनारायण महतो, सुखनाथ महतो, लक्ष्मण उरांव, रवि पहान, बबलू पहान, राजकुमार मुंडा, बुलट पहान, दिलीप पहान, सुदास पहान आदि ने भी अपने विचार रखे।

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