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फिल्म रिव्यू : विक्की डोनर

फिल्म रिव्यू : विक्की डोनर

आजकल कुछ ऐसा हो रहा है कि जिन फिल्मों से बहुत उम्मीद होती है, वो आधे रास्ते में ही धोखा दे जाती हैं और कम बजट की साधारण स्टार कास्ट वाली फिल्में दर्शकों का दिल जीत लेती हैं। ‘विक्की डोनर’ एक ऐसी ही फिल्म है। एक कम बजट की फिल्म के साथ जब निर्माता के रूप में जॉन अब्राहम जैसे सितारे का नाम जुड़ा तो इस फिल्म के प्रति उत्सुकता पैदा हुई।

दूसरी उत्सुकता इस फिल्म के विषय को लेकर हुई। देखने से पहले एक बार लगा कि निर्देशक सुजित सरकार ने स्पर्म डोनर के किरदार को केन्द्र में रख महज एक सनसनी-सी फैलाने की कोशिश की है। लेकिन आप सच जानिए कि फिल्म के पहले सीन से लेकर इंटरवल तक शायद ही कोई ऐसा मौका आएगा, जब आप टॉयलेट तक भी जाने की हिम्मत जुटा पाएं या धीमी आवाज में अपने फोन पर बात कर सकें।

न न न.. यह कोई सस्पेंस फिल्म नहीं है, बल्कि यह तो एक रोमांटिक कॉमेडी फिल्म है, जिसे एक फ्लॉप निर्देशक और एक नए निर्माता ने नई स्टार कास्ट (अनु कपूर वगैरह को छोड़ कर) के साथ मिल कर विद्या बालन के हिट डॉयलाग को दो तमगे और दे डाले हैं। यानी कि ‘विक्की डोनर’ में शुरु से अंत तक अगर कुछ है तो वह है एंटरटेनमेंट, एंटरटेनमेंट और एंटरटेनमेंट।

कहानी बेहद साधारण-सी है, लेकिन दिल्ली के देसी रंग में रंगी इसकी पटकथा में खालिसपन है, जो बांधे रखता है। दिल्ली का रहने वाला विक्की अरोड़ा (आयुष्मान खुराना) बेरोजगार है। उसकी मम्मी डॉली (डॉली अहलूवालिया) जैसे-तैसे एक ब्यूटी पार्लर चला रही हैं। विक्की के वेल्लेपन यानी आवारापन को लेकर उसकी बीजी (कमलेश गिल) से डॉली की रोज खटपट होती है। खूब लड़ने के बाद शाम को बीजी और डॉली अपना गम गलत करने बैठ जाती हैं।

उधर, एक इन्फर्टिलिटी क्लीनिक चलाने वाले डॉ. चड्ढा कुछ परेशान हैं। उन्हें एक जानदार स्पर्म डोनर की तलाश है। विक्की को देख वह ताड़ लेते हैं कि वही है उनके काम का बंदा। विक्की को एक स्पर्म डोनर के रूप में तैयार करने के लिए डॉ. चड्ढा दिन-रात एक कर देते हैं। लेकिन विक्की तो आशिमा (यामी गौतम) के चक्कर में पड़ चुका होता है, जो  एक बैंक में नौकरी करती है। आशिमा बंगाली है और विक्की पंजाबी, बस यही बात दोनों की शादी के आड़े आती है। उधर विक्की भी मजबूरी में स्पर्म डोनर बन जाता है और लाखों कमाने लगता है।

कुछ सालों बाद विक्की और आशिमा की भी शादी हो जाती है, लेकिन एक दिन आशिमा को विक्की की असलियत पता चल जाती है। इसमें कोई दो राय नहीं कि अनु कपूर एक कमाल के अभिनेता हैं। डॉ. चड्ढा के एक नीरस से दिखने वाले किरदार में उन्होंने हजारों रंग भर दिए हैं और वह भी आयुष्मान जैसे नए कलाकार के साथ।

आयुष्मान बेहद ओरिजिनल और देसी अपील के साथ हर सीन में अच्छे लगे हैं। जो बेफिक्री उनके किरदार में है, वही उनकी संवाद अदायगी में है। यामी गौतम की स्क्रीन प्रेजेन्स लुभाती है। उन्हें अगली फिल्म किसी बड़े स्टार के साथ मिलनी चाहिए।

इस फिल्म का संगीत भी सबसे अलग है। रम रम रम.. गीत फिल्म में दो बार है। बाकी गीत भी थिरकन बढ़ाने वाले हैं। अब मोटी बात यह कि दिल्ली में फिल्में तो बहुत बनती हैं, लेकिन लुभाने का अंदाज किसी-किसी के पास ही होता है।

कलाकार: आयुष्मान खुराना, यामी गौतम, अनु कपूर, डॉली अहलूवालिया, कमलेश गिल और जयंत दास
निर्देशक: सुजित सरकार
निर्माता: जॉन अब्राहम, इरोज इंटरनेशनल्र
संगीत: अभिषेक-अक्षय
कहानी-पटकथा: जूही चतुर्वेदी

पब्लिक कमेंट
मस्त मूवी है। अनु कपूर की एक्टिंग काबिले तारीफ है। आयुष्मान खुराना ने भी अच्छा काम किया है।
ऋषभ शर्मा, छात्र

फिल्म की कहानी काफी बोल्ड विषय पर है, इसलिए एक खास वर्ग के दर्शकों को ही यह फिल्म पसंद आएगी।
मयूर, छात्र

अच्छी फिल्म है। आयुष्मान और यामी गौतम की एक्टिंग अच्छी है। म्यूजिक भी ठीक-ठाक है। एक बार देखी जा सकती है।
विक्की, छात्र

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